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बुधवारीय आमदर्शन में संत पापा बुधवारीय आमदर्शन में संत पापा   (Vatican Media)

ईश्वर हममें परिवर्तन लाते हैं

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आर्मदर्शन समारोह, धर्मशिक्षा के दौरान साऊल के मन परिवर्तन का जिक्र करते हुए कहा कि ईश्वर हमें भी परिवर्तित करते हैं।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 09 अक्टूबर 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को प्रेरित चरित पर धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो और बहनों, सुप्रभात।

स्तीफन को पत्थर मारे जाने के परिदृश्य से एक युवा व्यक्तित्व जिसका नाम साऊल है हमारे सामने उभर कर आता है जो संत पेत्रुस के बाद अति विशिष्ट रुप में प्रेरित चर्चा का भाग है। (प्रेरि.7.58) प्रारंभ में उसकी चर्चा उस व्यक्ति को रुप में होती है जो स्तीफन की मौत को न्यायसंगत घोषित करता और कलीसिया को नष्ट करने की चाह रखता है (प्रेरि.8.3)। लेकिन बाद में वह ईश्वर द्वारा चुना हुए व्यक्ति बनता है जो देशों में सुसमाचार की घोषणा करता है।

साऊल की धुन

प्रधानयाजक से अधिकारिक अनुमति के उपरांत साऊल ख्रीस्तियों का पीछा करता और उन्हें गिरफ्तार करता है। इन कार्यों को करने में उसे इस बात की अनुभूति होती है कि वह ईश्वर के नियमों का पालन कर रहा है। संत लूकस लिखते हैं कि साऊल को प्रभु के शिष्यों को धमकाने तथा मार डालने का “धुन” सवार था। वह जीवन का नहीं वरन मौत का सौदागर बनता है।

बुराई के खिलाफ लड़ें

युवा साऊल को हम एक कट्टर व्यक्ति के रुप में पाते हैं जो उनके प्रति क्रूरता से पेश आता जो उससे भिन्न सोचते हैं। वह अपने राजनीतिक और धार्मिक विचारों में निरंशुक है जिसके फलस्वरूप वह दूसरों को शुत्र के रुप में देखता है। केवल ईश्वर के द्वारा रूपान्तरिक किये जाने के बाद वह सत्य की शिक्षा देना शुरू करता है, “हमें निरे मनुष्यों से नहीं बल्कि (...) इस अंधकारमय संसार के अधिपतियों और दुष्ट आत्माओं से संघर्ष करना पड़ता है।” (एफे.6.12) संत पापा ने कहा कि वे हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि हमें व्यक्तियों से नहीं बल्कि बुराई से जो हमारे कार्यों को प्रभावित करते हैं युद्ध करने की आवश्यकता है।

मैं कैसा हूँॽ

साऊल का क्रोध और अपने में युद्ध की स्थिति हम प्रत्येक से इस बात की मांग करती है कि हम अपने आप से यह पूछें, मैं अपने विश्वास को किस रूप में जीता हूँॽ क्या मैं दूसरों से मिलता हूँ या मैं उनके विरूद्ध हूँॽ क्या मैं वैश्विक कलीसिया का अंग हूँ या मेरे कुछ चुने हुए आदर्श हैंॽ क्या मैं ईश्वर से प्रेम करता हूँ या धर्म सिद्धांतों सेॽ मेरा समर्पित जीवन कैसा हैॽ ईश्वर पर मेरा विश्वास मुझे मित्रता की भावना से पेश आने में मदद करता या मैं दूसरों को शुत्रता की भावना से देखता हूँ जो मुझ से भिन्न हैंॽ

विश्वासियों के संग येसु ख्रीस्त

संत लूकस कहते हैं कि एक ओर साऊल ख्रीस्तीय समुदाय को जड़ से उखाड़ने की कोशिश में है तो दूसरी ओर ईश्वर उसके हृदय का स्पर्श करते, उसमें परिवर्तन लाते और उसे अपने कार्यों में नियुक्त करते हैं। पुनर्जीवित येसु अपनी ओर से पहल करते हुए दमिश्क की राह में साऊल को प्रकट होते जिसका जिक्र प्रेरित चरित हमें तीन बार करता है (प्रेरि.9.3-19, 22.3-21, 26.4-23)। “प्रकाश” और “आवाज” इस द्विपद जो ईश्वरीय अभिव्यक्ति की विशिष्टता है, पुनर्जीवित प्रभु साऊल को दिखाई देते और उसे अपने को सताये जाने का कारण पूछते हैं, “साऊल, साऊल तुम मुझ पर क्यों अत्याचार करते होॽ”(प्रेरि. 9.4) यहां हम पुनर्जीवित येसु को उनके साथ खड़ा होता पाते हैं जो उनमें विश्वास करते हैं, कलीसिया के किसी एक सदस्य का सताया जाना स्वयं येसु ख्रीस्त को प्रताड़ित करना है। संत पापा ने कहा कि हम जो कलीसिया में अपनी “पवित्रता” को आदर्श के रुप में नुमाईश करते येसु ख्रीस्त को दुःख पहुँचाते हैं।  

येसु की आवाज साऊल से कहती है, “उठो और शहर जाओ, तुम्हें जो करना है वह तुम्हें बताया जायेगा”। एक समय अपने पैरों में खड़ा होने वाला साऊल को कुछ दिखाई नहीं देता है, वह अंधा हो गया है। एक शक्तिशाली व्यक्ति, अधिकारी और स्वतंत्र मानव अपने को कमजोर पाता है जिसे दूसरों की सहायता की जरुरत होती है उसे दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। ख्रीस्त की ज्योति ने उसे अपनी चमक से अंधा बना दिया है। संत पापा ने कहा,“यह बाह्य रूप में हमारा ध्यान आंतरिक सच्चाई, सत्य के प्रति उसकी दृष्टिविहीनता की ओर कराता है, वह ख्रीस्त रुपी ज्योति को नहीं जानता है” (संत पापा बेनेदिक्त 16वें आमदर्शन समारोह, 3 सितम्बर 2008)।

येसु हमें बदलते हैं

पुनर्जीवित येसु का साऊस के शरीर का स्पर्श उसमें परिवर्तन की बंयार लाता है जो उसके “व्यक्तिगत पास्का” मृत्यु से जीवन में प्रवेश करने को दिखलाता है। पहले जो महिमा का कारण था वह अब “कूड़ा” में तब्दील हो चुका है। वह सारी चीजों का परित्याग करता जिससे वह सच्चे धन को प्राप्त कर सके, जो उसमें जीवित हैं। (फिलि.3.7-8)

संत पापा ने कहा कि इस भांति बपतिस्मा साऊल के लिए और हम सभों के लिए जीवन की एक नई शुरूआत है। इसके फलस्वरुप ईश्वर की नई कृपा दृष्टि हम सबों के ऊपर बनी रहती जहाँ हम शुत्रओं से, ख्रीस्त में भाइयों के रुप में बदल जाते हैं।

हम ईश्वर पिता से निवेदन करें कि वे हमें भी साऊल की भांति अपने प्रेम को अनुभव करने की शक्ति दे जो कठोर हृदय को कोमल हृदय में परिवर्तित करता है, जिसमें हम “येसु खीस्त के मनोभावों को अपने में अनुभव करते हैं” (फिलि. 2.5)।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सबों के संग हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। 

09 October 2019, 15:48