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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (Vatican Media )

सच्ची ख्रीस्तीयता की पहचान सेवा में

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में प्रेरित चरित पर धर्मशिक्षा माला के क्रम में प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय के जीवन पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 21 अगस्त 2019 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा पौल षष्टम के सभागार में विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को “प्रेरित चरित” पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व संबोधित करते हुए कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

ख्रीस्तीयता की पहचान

ख्रीस्तीय समुदाय का जन्म और विकास पवित्र आत्मा की आशीष की प्रचुरता में होती है, हम अपने बीच इस खमीर को साझा करने हेतु ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं। हम कलीसिया में एकात्मकता के एक आयाम को पाते हैं जो हमें ईश प्रजा के रुप में संगठित करती जिसका केन्द्र बिन्दु “कोईनोनिया” है। इस शब्द का अर्थ क्या हैॽ संत पापा ने कहा, “यह एक इब्रानी शब्द है जिसका अर्थ “समुदाय में देना, बांटना, साझा करना, सहभागी होना” है, यह समुदाय में रहना है न की समुदाय से अलग। प्रारंभिक कलीसिया में “कोईनोनिया” का तत्पर्य येसु ख्रीस्त के शरीर और रक्त में सहभागिता से है। यही कारण है कि जब हम एकता में जमा होते तो हम अपने को एक-दूसरे के साथ बांटते, जो हमें येसु ख्रीस्त के साथ संयुक्त करता और हम उनमें अपनी एकता के फलस्वरूप अपने भाई-बहनों के साथ एकता में बने रहते हैं। इस भांति यूखारिस्तीय बलिदान की एकता जहाँ हम येसु के शरीर और रक्त को अपने जीवन में ग्रहण करते हमें भ्रातृत्वमय एकता में विकसित करती, और तब हम माता कलीसिया और दूसरी कलीसियाओं के कार्यों में हाथ बंटाने हेतु चीजों और दान जमा करते हैं जो हमारे लिए एक कठिन एकता है। संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि यदि आप इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि आप अच्छे ख्रीस्तीय हैं तो आप को प्रार्थना करते हुए दूसरों के साथ एकता और मेल-मिलाप में रहने की जरुरत है। लेकिन इन बातों की निशानी को हम अपने हृदय परिवर्तन में तब पाते हैं जब हमारे हाथ थैलों तक पहुंचते और हम अपनी उदरता में गरीबों और कमजोरों के सेवार्थ अपने को देते हैं। इस मुकाम तक हमारा पहुँचना इस बात को सत्यापित करता है कि हमारा परिवर्तन सच्चा है। यदि हम अपने शब्दों और हाव-भाव तक ही सीमित हो कर रह जाते तो यह सच्चा परिवर्तन नहीं है।   

कलीसियाः “एकहृदय और एकप्राण”

प्रेरित चरित में ख्रीस्तीय समुदाय को हम “एकहृदय और एकप्राण” के रुप में परिभाषित पाते हैं। वे अपने धन को अपना नहीं समझते लेकिन जो कुछ उनके पास था, उसमें सभी का साझा था। (प्रेरि.4.32) यह एक आदर्श था औऱ वे उदारता में सेवा हेतु नहीं थकते थे। इसी कारण उनके बीच में कोई कंगाल नहीं था, “क्योंकि जिनके पास खेत या मकान थे, वे उन्हें बेच देते और कीमत लाकर प्रेरितों के चरणओं में अर्पित करते थे। प्रत्येक को उनकी आवश्यकता अनुसार बांटा जाता था।” (प्रेरि. 4. 34-35) संत पापा ने कहा कि कलीसिया के ख्रीस्तियों में इस तरह के मनोभावों थे जिन्होंने जरुरतमंदों की सेवा हेतु अपना वो सब कुछ बेच दिया, जिन चीजों की आवश्यकता उन्हें नहीं थी। उन्होंने न केवल अपना धन दिया वरन जरूरत में पड़े लोगों के लिए अपना समय दिया। इटली में हमारे बीच कितने ख्रीस्तीय हैं जो स्वयंसेवियों के रुप में दूसरों के लिए, जरुरत में पड़े लोगों की सेवा हेतु अपने को देते हैं, यह कितनी सुन्दर बात है। यह हमारी सामुदायिकता को दिखलाती है जहाँ हम करूणा के कार्य करते, अपनी चिंता किये बिना दूसरों की सेवा में अपने को देते हैं।

प्रेम ख्रीस्तीयता का आदर्श

संत पापा ने कहा कि समुदाय या इब्रानी शब्द “कोईनोनिया” इस तरह हमारे बीच एक नये संबंध के आदर्श को प्रस्तुत करती है जिसे हम शिष्यों और येसु के बीच पाते हैं। ख्रीस्तीय अपने में एक नये व्यवहार को दिखलाते हैं यहाँ तक कि गैर-ख्रीस्तीय उसका अनुभव करते और कहते हैं, “देखो वे कैसे एक दूसरे को प्रेम करते हैं।” यह प्रेम का आदर्श था जो शब्दों में और झूठा नहीं था। यह प्रेममय कार्य था जहाँ वे एक दूसरे की सेवा करते और अपने प्रेम को ठोस रुप में व्यक्त करते थे। येसु ख्रीस्त हमारे भाई-बहनों के बीच एक संबंध स्थापित करने को कहते हैं जो एक-दूसरे में प्रवाहित होता और भौतिक वस्तुओं के द्वारा एकता में स्थापित होता है। संत पापा ने कहा, “हाँ, यह दयालुता, एकता में रहना, प्रेम, हमें आखिरकार अपनी जेब तक ले चलता है जहाँ हम धन के बंधन से मुक्त होते और उसे दूसरों के लिए देते हैं।” हम एक दूसरे के प्रति उत्तरदायी होते और अपना समय उन्हें देते हैं। उन्होंने कहा कि एक ख्रीस्तीय के रुप में हम दूसरों की तकलीफों को देखकर तटस्थ नहीं रह सकते हैं। यदि कारण है कि शक्तिशाली कमजोरों की सहायता करते हैं जिससे मानवता का स्वरुप अपने में कुरूप न हो, क्योंकि हम एक समुदाय में निवास करते हैं। यह इस बात को घोषित करती है कि हम एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। यह हमारे लिए प्रेम की ठोस निशानी है।

प्रेरितगण कलीसिया के स्तंभ

पेत्रुस, योहन और याकूब तीनों प्रेरित येरुसलेम की कलीसिया हेतु “स्तंभ” हैं जिन्होंने यहूदियों के बीच सुसमाचार का प्रचार किया जैसे कि पौलुस और बरनाबस ने गैर-ख्रीस्तियों के मध्य येसु ख्रीस्त की ज्योति जलाई। वे हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि हम गरीबों को न भूलें। (गला.2.9-10) हम केवल उनकी याद न करें जो भौतिक रुप में गरीब हैं वरन उनकी भी सुधि लें जो आध्यात्मिक रुप से गरीब हैं, जो तकलीफों में पड़े हमारी सहायता और निकटता की आशा करते हैं। संत पापा ने कहा कि एक ख्रीस्तीय इसे स्वयं अपने हृदय से शुरू करता और येसु के निकट अपने को लाता है जैसे कि येसु हमारे निकट आते हैं। इस तरह हम प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय बनते हैं।

पाखंडता विनाश का कारण

धर्मग्रंथ में व्यक्तिगत संपति को बेचने और समुदाय की सेवा करने का उदाहरण हमें बरनाबस के साक्ष्य में मिलता है। “उसकी एक जमीन थी। उसने उसे बेच दिया और उसकी कीमत लाकर प्रेरितों के चरणों में अर्पित कर दी।” (प्रेरि.4. 36-37) लेकिन वहीं प्रेरित चरित के अध्याय पांच पद 1 से 2 में हम इसके विपरीत एक नकारात्मक चर्चा सुनते हैं, “अनानीयस ने अपनी पत्नी सफीरा से परामर्श करते हुए एक जमीन बेच दी। उन्होंने उसकी कीमत के एक अंश को अपने पास रखा और दूसरा अंश प्रेरितों के चरणों में रख दिया।(प्रेरि. 5.1-2) यह धोखाधड़ी स्वतंत्रता और उदारता पूर्ण देने की कड़ी को विखंडित करती है जिसका परिणाम बुरा होता है। (5.5-10) हम कह सकते हैं कि अनानीयस ने पृथक विवेक, एक पाखंडी विवेक के कारण ईश्वर से झूठ बोला, यह “तोल-मोल”, आंशिक और अवसरवादी, अधूरे रूप में कलीसिया से हमारे संबंध को व्यक्त करता है। संत पापा ने कहा कि पंखडता ख्रीस्तीय समुदाय और प्रेम का सबसे बुरा शत्रु है। इसके द्वारा हम प्रेम का एक दिखावा करते और अपने स्वार्थ तक ही सीमित रहते हैं।

भ्रातृत्व हेतु आहृवान

उदारता में साझा करने की असफलता वास्तव में, प्रेम में उदारता की कमी को दिखलाती है जो हमें सच्चाई से दूर कर देती और हम अपने में स्वार्थ से घिरा जाते हैं, यह हममें सामुदायिकता की आग को बुझा देती और हमें आंतरिक रुप में मृतप्राय बना देती है। इस तरह का व्यवहार करने वाले कलीसिया में एक तीर्थयात्री की तरह होते हैं- संत पापा ने कहा कि कलीसिया में बहुत से तीर्थयात्री हैं जो हमेशा यात्रा करते लेकिन गिरजाघर में कभी प्रवेश नहीं करते हैं। यह एक आध्यात्मिक यात्रा है जहाँ वे अपने में ख्रीस्तीय होने का विश्वास करते हैं जबकि वे भूगर्भ कब्रिस्तान की भेंट करते हैं। उन्होंने कहा कि हम कलीसिया में तीर्थयात्री नहीं बल्कि एक दूसरे के लिए भाई बनें। दूसरे के जीवन और परिस्थिति से लाभ उठाना हमें आंतरिक रुप से मार डालता है। आज कितने ही लोग हैं जो अपने को कलीसिया के निकट बतलाते, पुरोहितों, धर्माध्यक्षों के मित्र होने की बात कहते लेकिन वे केवल अपने ही फायदे की सोचते हैं। ऐसे लोग पाखंडी हैं जो कलीसिया का नाश करते हैं।

पवित्र आत्मा से निवेदन

संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा के अंत में सभों के लिए ईश्वर से निवेदन करते हुए कहा कि ईश्वर हम सभों को पवित्र आत्मा की करूणा से प्रोषित करें जो हमसे पाखंडता को दूर करते और ख्रीस्तीय एकता को हमारे बीच प्रसारित करते हुए हमें एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं वरन कलीसिया के मातृत्व रुप को अत्यंत गरीबों के लिए व्यक्त करने में मदद करते हैं। 

21 August 2019, 15:54