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फातिमा की माता मरियम का जुलूस फातिमा की माता मरियम का जुलूस  (AFP or licensors) कहानी

फातिमा की माता मरिया का दिव्यदर्शन

पुर्तगाल के फातिमा स्थित माता मरियम का तीर्थस्थान यूरोप का एक प्रमुख तीर्थस्थान है। यहाँ हर रोज हजारों श्रद्धालु तीर्थयात्रा करते और माता मरियम को अपनी अर्जियाँ चढ़ाते हैं। तीर्थयात्रा की स्थापना, माता मरियम की इच्छा पर की गयी है। तीर्थस्थान उसी जगह पर स्थापित है जहाँ, भेड़ चरा रहे तीन बच्चों लुसी, जसिन्ता एवं फ्राँसिस को माता मरियम ने 6 बार दर्शन दिये थे।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

पुर्तगाल के फातिमा स्थित माता मरियम का तीर्थस्थान यूरोप का एक प्रमुख तीर्थस्थान है। यहाँ हर रोज हजारों श्रद्धालु तीर्थयात्रा करते और माता मरियम को अपनी अर्जियाँ चढ़ाते हैं। तीर्थयात्रा की स्थापना, माता मरियम की इच्छा पर की गयी है जिन्होंने श्रद्धालुओं को रोजरी माला विन्ती करने एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना करने को कहा है। तीर्थस्थान उसी जगह पर स्थापित है जहाँ, भेड़ चरा रहे तीन बच्चों लुसी, जसिन्ता एवं फ्राँसिस को माता मरियम ने 6 बार दर्शन दिये थे। जिन दिनों दिव्यदर्शन हो रहे थे, दुनिया में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा हुआ था।

संत जसिन्ता और संत फ्राँसिस
संत जसिन्ता और संत फ्राँसिस

1917 की रूसी क्रांति बीसवीं सदी के विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना रही। प्रथम विश्व युद्ध के कारण पूरे विश्व में अशांति थी और माता मरियम चाहती थीं कि युद्ध समाप्त हो तथा विश्व में शांति स्थापित हो। इसके लिए उन्होंने रोजरीमाला विन्ती एवं त्याग तपस्या करने की सलाह दी। आज भी विश्व में शांति की आवश्यकता है।

फातिमा में माता मरियम का पहला दिव्यदर्शन

रोज दिन की तरह रविवार 13 मई 1917 को बच्चे कोवा दा इरिया में भेड़ चरा रहे थे। यह स्थान उनके घर से एक मील की दूरी पर थी। जब वे खेल रहे थे तब अचानक प्रकाश की एक तेज किरण ने हवा को छेद दिया। उन्होंने उसे बिजली का चमकना समझा। पर यह बिजली का चमकना नहीं था। यह एक प्रकाश की चमक थी जो धीर- धीरे उनकी ओर बढ़ने लगी। उस प्रकाश से भयभीत बच्चे आकाश की ओर ताकने लगे किन्तु उस समय आकाश बिलकुल साफ था और बादल का नामोनिशान नहीं था। धूप तेज थी और आंधी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। बच्चों ने सोचा कि उन्हें घर लौटना बेहतर होगा क्योंकि थोड़ी देर में बारिश हो सकती है। जब वे पहाड़ से उतरे, तब उन्होंने दूसरी बार तेज रोशनी को देखा। डर के कारण वे कुछ कदम आगे बढ़े एवं दाहिनी ओर देखा, वहाँ एक झाड़ी के ऊपर श्वेत वस्त्र पहने एक महिला दिखाई दी, जिसके वस्त्र सूर्य से भी अधिक चमकीले थे।

फातिमा की माता मरियम
फातिमा की माता मरियम

उस महिला ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा, "डरो मत मैं तुम्हें हानि नहीं पहुँचाऊँगी।" "आप कहाँ से हैं?" बच्चों ने उनसे पूछा। "मैं स्वर्ग से हूँ" उस सुन्दर महिला ने सज्जनता से जवाब दिया। बच्चों में से एक लुसी ने पूछा, "आप हमसे क्या चाहती हैं?" उसने जवाब दिया, "मैं यह कहने आयी हूँ कि तुम छः महीनों तक 13 तारीख को एक ही समय पर यहाँ आया करो। मैं तुमको बाद में बतलाऊँगी कि मैं कौन हूँ और क्या चाहती हूँ।" लुसी ने कहा, "क्या आप स्वर्ग से आयी हैं और क्या मैं स्वर्ग जा सकती हूँ।" उन्होंने जवाब दिया "हाँ तुम जा सकती हो।" लुसिया ने पूछा, "क्या जसिन्ता और फ्रांचेस्को भी?" "हाँ वे भी जा सकते हैं किन्तु बहुत रोजरी विन्ती करना होगा।" अंत में माता मरियम ने कहा, "क्या तुम अपने आपको ईश्वर को समर्पित करना चाहते हो, उन सभी पीड़ितों के लिए जिनको वे तुम्हारे लिए, उनके पापों के प्रायश्चित एवं मन-परिवर्तन हेतु भेजेंगे।" बच्चों ने कहा, "जी हाँ हम ऐसा करेंगे।" तुम्हें इसके लिए बहुत दुःख सहना पड़ेगा किन्तु ईश्वर की कृपा ही तुम्हारी सांत्वना होगी। तब उसने एक ममतामय माता के समान हाथ खोला एवं उन्हें अपना स्नेह अर्पित किया। इसके साथ ही एक तेज रोशनी उनकी ओर आयी। वे यह कहते हुए वहाँ से ओझल हो गयीं, "हर दिन विश्व में शांति एवं युद्ध विराम के लिए रोजरी माता विन्ती करो।"

दूसरा दिव्यदर्शन

माता मरियम का दूसरा दिव्यदर्शन 13 जून 1917 को हुआ जहाँ 50 लोग उपस्थित थे। जब बच्चे रोजरी माला विन्ती कर रहे थे, तब फिर से बिजली की चमक दिखाई पड़ी और मई महीने की तरह वहाँ झाड़ी के ऊपर महिला दिखाई दी। लुसी ने पूछा, "आप हमसे क्या चाहती हैं?" तब उन्होंने कहा, "मैं चाहती हूँ कि तुम अगले माह के 13 तारीख को भी यहाँ आओ, हर दिन रोजरी माता विन्ती करो और पढ़ना सीखो। अगला महिना बतलाऊँगी कि मैं और क्या चाहती हूँ।" लुसी ने कहा, "मैं चाहती हूँ कि आप हमें स्वर्ग ले जाएँ।" मरियम ने कहा, "हाँ जसिन्ता और फ्राँसिस जल्द ही जायेंगे किन्तु तुम्हें लम्बे समय तक यहाँ रहना होगा। येसु चाहते हैं कि लोग मुझे जानें और प्यार करें, इसमें तुम उनकी मदद करो। ईश्वर चाहते हैं कि तुम कुछ समय के लिए दुनिया में ही रहो ताकि मेरे निष्कलंक हृदय की भक्ति विश्वभर में फैल जाए।"   

मैं उन लोगों के लिए मुक्ति की प्रतिज्ञा करती हूँ जो इसे अपनाते हैं। उनकी आत्मा उसी तरह ईश्वर द्वारा प्यार की जायेंगी, जिस तरह मेरे द्वारा उनके सिंहासन पर सजाये गये फूलों से की जाती है।" लुसी ने कहा, "क्या मैं यहाँ अकेली रह जाऊँगी?"  निराश मत होओ मैं तुम्हारे साथ होऊँगी। मेरा निष्कलंक हृदय तुम्हारी शरण होगी और उसके द्वारा तुम ईश्वर के पास पहुँचोगी। इसे बाद उसने अपना हाथ खोला तथा उससे रोशनी निकली। जसिन्ता एवं फ्राँसिस उस रोशनी में थे जो ऊपर की ओर जा रही थी जबकि लुसिया नीचे पृथ्वी पर फैलने वाली रोशनी में। माता मरियम की दाहिनी हथेली पर हृदय था जिसपर कांटों का मुकुट जड़ा हुआ था। वे समझ गये कि यह माता मरियम का निष्कलंक हृदय था जो लोगों के पापों के कारण तिरस्कृत था। तब उसने उन्हें पश्चाताप करने को कहा।

फातिमा की माता मरियम
फातिमा की माता मरियम

तीसरा दिव्यदर्शन

तीसरा दिव्यदर्शन 13 जुलाई 1917 को हुआ जब बच्चे भीड़ के साथ रोजरी माला विन्ती कर रहे थे। उन्हें पहले की भांति प्रकाश की किरण दिखाई दी, जिसमें माता मरियम प्रकट हुई। लुसी ने पुनः पूछा, आप हमसे क्या चाहती हैं? तब उसने कहा, "अगले महीने के 13 तारीख को फिर आना। विश्व में शांति एवं युद्ध विराम के लिए हर दिन रोजरी माला विन्ती करते रहना क्योंकि उसी के द्वारा मदद मिल सकती है।" लुसी ने कहा मैं जानना चाहती हूँ कि आप कौन हैं तथा कृपया आप भीड़ के लिए कोई चमत्कार करें, जिसको देखकर लोग यह विश्वास कर सकें कि हमने आपने दर्शन किये हैं। माता मरियम ने कहा कि तुम यहाँ आना जारी रखो। मैं अक्टूबर माह में बतलाऊंगी और चमत्कार दिखाऊँगी जिसको देखकर लोग विश्वास करेंगे। पापियों के लिए त्याग करो तथा त्याग करते समय इस प्रार्थना को दुहराओ, "हे मेरे येसु, मैं इसे आपके प्रेम के लिए चढ़ाती हूँ। पापियों के मन-फिराव एवं माता मरियम के निष्कलंक हृदय के विरूद्ध हुए पापों के बदले चढ़ाती हूँ। ऐसा कहने के बाद, उन्होंने अपना हाथ फैलाया तथा उनसे एक तेज रोशनी निकली और धरती पर पड़ी। अचानक धरती गायब हो गयी और बच्चों को नरक का दृश्य दिखाई दिया। डर के मारे वे कुँवारी मरियम की ओर देखने लगे। मरियम ने कहा, "तुमने नरक देखा है जहाँ पापियों की आत्माएँ जाती हैं। भविष्य में आत्माओं को बचाने के लिए ईश्वर चाहते हैं कि विश्व में मेरे निष्कलंक हृदय की भक्ति का प्रचार किया जाए। यदि लोग इसकी भक्ति करेंगे तो कई आत्माएँ बच जायेंगे।"

माता मरियम ने अपने तीसरे दिव्य दर्शन में बच्चों से कहा, "भविष्य में आत्माओं को बचाने के लिए, ईश्वर, मेरे निष्कलंक हृदय की भक्ति स्थापित करना चाहते हैं। यदि लोग उन चीजों को करेंगे जिनको मैं करने के लिए कहती हूँ तो कई आत्माएँ बच जाएँगी।" उसके बाद उन्होंने कहा, "यदि मेरे आग्रह को पूरा किया जाएगा तब रूस का मन-परिवर्तन होगा और वहाँ शांति स्थापित होगी। यदि नहीं तो वह अपनी बुराई को पूरी दुनिया में फैलायेगा। युद्ध होंगे और कलीसिया पर अत्याचार किया जाएगा। अच्छे लोग शहीद होंगे, संत पापा को बहुत अधिक दु˸ख होगा और कई राष्ट्र नष्ट कर दिये जायेंगे किन्तु अंत में मेरे निष्कलंक हृदय की ही जीत होगी। जब संत पापा रूस को मेरे हृदय के लिए समर्पित करेंगे तब रूस का मन-परिवर्तन होगा और कुछ समय के लिए दुनिया में शांति आयेगी। क्या तुम लोग एक प्रार्थना सीखना चाहोगे? बच्चों ने कहा, "जी हाँ हमलोग सीखेंगे।" जब तुम रोजरी प्रार्थना करोगे तो दस प्रणाम मरिया विन्ती करने के बाद ये प्रार्थना करना, "हे मेरे येसु, हमारे पापों की क्षमा कर, हमें नरक की अग्नि से बचा, सभी आत्माओं को स्वर्ग की ओर ले चल, उन्हीं आत्माओं की विशेष याद कर, जिन्हें तेरी दया की अति आवश्यकता है।"

माता मरियम का चौथा दिव्यदर्शन

अगस्त माह में 13 तारीख को माता मरियम से मुलाकात करने हेतु बच्चों को नागरिक अधिकारियों द्वारा रोका जा रहा था। उन्हें रोकने के लिए धमकाया जा रहा था और विभिन्न तरह से यातनाएँ दी जा रही थी किन्तु वे नहीं रूके, माता मरियम से की गई प्रतिज्ञा के लिए वे अपना जीवन देने के लिए भी तैयार थे। 19 अगस्त को जब उन्हें मुक्त किया गया, तब वे वलिंहोस नामक स्थान गये जहाँ उन्होंने एक झाड़ी के ऊपर माता मरियम को देखा। लुसी ने पूछा, "आप मुझसे क्या चाहते हैं? मैं चाहती हूँ कि तुमलोग इरिया के कोवा में 13 तारीख को आते रहो और हर दिन रोजरी माला विन्ती करो। मैं अंतिम माह में चमत्कार करूँगी जिससे सभी लोग विश्वास कर सकें। तब उदास होकर माता मरियम ने कहा, "पापियों के लिए बहुत प्रार्थना एवं तपस्या करो।" मैं जानती हूँ कि बहुत सारी आत्माएँ नरक जाती है क्योंकि उनके लिए प्रार्थना करने वाला कोई नहीं हैं।

फातिमा की माता मरियम
फातिमा की माता मरियम

पाँचवाँ दिव्यदर्शन

13 सितम्बर को बच्चों के साथ करीब 30,000 लोग इरिया के कोवा गये। वे रोजरी माला विन्ती कर रहे थे, तभी माता मरियम झाड़ी के ऊपर प्रकट हुईं। उन्होंने बच्चों से कहा, "मैं चाहती हूँ कि तुमलोग 13 अक्टूबर को भी यहाँ आना तथा युद्ध का अंत होने के लिए रोजरी करते रहना।" अक्टूबर में प्रभु, दुःखों की माता, कार्मेल की माता एवं बालक येसु के साथ संत जोसेफ दुनिया को आशीष प्रदान करने आयेंगे। तुम्हारे त्याग से ईश्वर खुश हैं।

छटवाँ दिव्यदर्शन

13 अक्टूबर 1917 को मूसलधार वर्षा के बावजूद लुसी, जसिन्ता एवं फ्राँसिस के चारों ओर करीब 70,000 लोग जमा हो गये थे। इसी बीच माता मरियम ने बच्चों को छटवीं बार दर्शन दिया। लुसी ने उनसे पूछा, आप हमसे क्या चाहती हैं? उन्होंने उत्तर दिया, "मैं रोजरी की माता मरिया हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे सम्मान में एक गिरजाघर का निर्माण किया जाए, ताकि लोग हर दिन रोजरी माता विन्ती कर सकें। युद्ध समाप्त होने वाला है और सैनिक जल्द ही अपने घर लौटेंगे।" तब लुसी ने पूछा, "क्या मैं आपसे चंगाई एवं मन-परिवर्तन के लिए भी प्रार्थना कर सकती हूँ और क्या आप उन्हें प्रदान करेंगे? माता मरियम ने कहा, "कुछ लोगों को चंगाई मिलेगी और कुछ को नहीं। यह आवश्यक है कि वे अपने पापों के लिए पश्चाताप करें। हमारे प्रभु ईश्वर के विरूद्ध पाप नहीं करें, उनका बहुत अधिक विरोद्ध किया गया है।" इसके अलावा क्या आप हमसे कुछ दूसरी चीजें भी चाहती हैं, लुसी ने पूछा। माता मरियम ने उत्तर दिया," इससे ज्यादा मैं और कुछ नहीं चाहती हूँ।"   

फातिमा का महागिरजाघर
फातिमा का महागिरजाघर

सबसे बड़ा चिन्ह

तब माता मरियम ने अपने हाथ खोले और उनसे प्रकाश की किरण निकली जो सूर्य की ओर बढ़ी। इसी क्षण प्रतिज्ञात चिन्ह प्रकट हुआ। लुसी ने सभी को सूर्य की ओर देखने को कहा। अचानक वर्षा थम गयी और सूर्य दिखाई पड़ा, किन्तु वह चौंधियाने वाला नहीं था। सूरज विभिन्न दिशाओं की ओर अनेक रंगों में अपना प्रकाश देने लगा जिसने बादल, आकाश, पेड़ एवं भीड़ को रंगीन बना दिया।

यह स्थिति कुछ देर तक बनी रही, उसके बाद स्थिति सामान्य हो गयी। कुछ देर सामान्य स्थिति में रहने के बाद सूर्य फिर जोर से चमकने लगा। अचानक ऐसा लगा मानो कि सूर्य आकाश से नीचे भीड़ के ऊपर गिरने वाला है यह भयावाह दृश्य था, लोग डर से घुटनी टेककर दया याचना करने लगे। उसके बाद तीनों बच्चों ने माता मरियम को श्वेत चमकीले वस्त्र एवं नीले रंग के लबादे में देखा। संत जोसेफ बालक येसु को गोद लिए हुए थे और दुनिया को आशीष प्रदान कर रहे थे। इसके बाद दुःखों की माता मरियम के बगल में खड़े होकर प्रभु ने दुनिया को आशीष प्रदान की और माऊँट कार्मेल की मरिया भी प्रकट हुई। जब दिव्यदर्शन समाप्त हुआ तब लोगों ने महसूस किया कि उनके गीले कपड़े पूरी तरह सूख गये थे।

माता मरियम के संदेश के अनुसार 4 अप्रैल 1919 को छोटी उम्र में फ्राँसिस का निधन हो गया और जसिन्ता 20 फरवरी 1920 को परलोक सिधर गयी किन्तु लुसी ने कॉन्वेंट में प्रवेश किया।

कोएमब्रा कॉन्वेंट में प्रवेश

लुसी ने लिखना और पढ़ना सीखने के लिए संत दोलोरोसा की धर्मबहनों के कॉन्वेंट में दाखिला लिया। उसके बाद उन्होंने कोएमब्रा कॉन्वेंट में प्रवेश किया।

10 दिसम्बर 1925 को सिस्टर लुसी ने बालक येसु एवं कुँवारी मरियम का दिव्यदर्शन देखा। कुँवारी मरियम का हृदय कांटों से घिरा था। कुँवारी मरियम ने लुसी से कहा, "देखो मेरी बेटी, मेरा हृदय कांटों से घिरा है जिसको कृतघ्न लोगों ने ईशनिंदा एवं कृतघ्नता द्वारा चुभाया हैं। लोगों को बतलाओ कि जो लोग इसका बदला देने के लिए पाँच महीनों तक प्रथम शनिवार को पापस्वीकार करते, पवित्र परमप्रसाद ग्रहण करते, रोजरी माला विन्ती करते और 15 मिनट तक रोजरी के भेदों पर चिंतन हैं, मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि उनकी मृत्यु की घड़ी, उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए आवश्यक कृपा के साथ मैं उनका साथ दूँगी।

लूसी को पुनः दिव्यदर्शन

जैसा कि 13 जुलाई 1917 को धन्य कुँवारी मरियम ने कहा था कि वे रूस के समर्पण की मांग करने आयेगी। वे 13 जून 1929 को दोलोरोसा के प्रार्थनालय में लुसी के सामने प्रकट हुईं। लुसी अपनी सुपीरियर एवं पाप मोचक से अनुमती ले कर हर बृहस्पतिवार एवं शुक्रवार की रात 11 बजे से मध्यरात्रि तक प्रार्थना करती थी। एक रात जब वह वेदी के निकट घुटनी टेक कर प्रार्थना कर रही थी। थकान महसूस करने के कारण वह खड़ी हो, दोनों हाथों को फैलाकर प्रार्थना कर रही थी। वहाँ केवल पवित्र संदुक की बत्ती जल रही थी। अचानक पूरे प्रार्थनालय में प्रकाश हो गया। वेदी के ऊपर एक प्रकाश प्रकट हुआ जिसका ऊपरी छोर छत से लगा हुआ था। क्रूस के ऊपरी भाग में एक आदमी का चेहरा दिखाई दिया, जिसका शरीर कमर तक दिखाई दे रहा था। उसकी छाती से प्रकाश निकाल रहा था। कमर से कुछ नीचे एक कटोरा एवं उसके ऊपर परमप्रसाद दिखाई दे रहा था। येसु के चेहरे और बगल से खून बह रहा था जो परमप्रसाद से होते हुए कटोरे में टपक रहा था। क्रूस के बगल में माता मरियम खड़ी थी जिनके साथ में उनका पवित्र हृदय था।

तब माता मरियम ने कहा, "समय आ गया है जब ईश्वर ने संत पिता को विश्व के सभी धर्माध्यक्षों से मिलकर रूस को मेरे पवित्र हृदय को समर्पित करने के लिए कहा है। कई आत्माएँ हैं जो मेरे हृदय के विरूद्ध पाप करने के कारण दण्डित किये जाते हैं। तुम इसके लिए त्याग और प्रार्थना करो।"

संत फ्राँसिस, संत जसिन्ता भेड़ चराते
संत फ्राँसिस, संत जसिन्ता भेड़ चराते

जसिन्ता द्वारा दिव्यदर्शन की कई अन्य बातें

अपनी मृत्यु से पहले जसिन्ता ने उन सभी बातों को प्रकट किया जिनको माता मरियम ने आत्माओं को बचाने के लिए बतलाया था। उन्होंने कहा कि कई आत्माएँ किसी दूसरे कारण से नहीं बल्कि शरीर के पाप के कारण नरक जाती हैं।

विवाह- अनेक विवाह जो मान्य नहीं होते, वे प्रभु को दुःख देते हैं और वे ईश्वर के नहीं हैं।

पुरोहित- पुरोहितों को शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। कलीसिया एवं आत्माओं के अलावा उन्हें किसी अन्य चीज पर ध्यान नहीं देना चाहिए। पुरोहितों द्वारा अपने अधिकारी एवं संत पापा की अवज्ञ प्रभु को बहुत दुःख देती है।

पापी- धन्य कुँवारी मरियम अपने पुत्र के हाथों को रोक कर नहीं रख सकतीं जो उन लोगों पर पड़ते हैं जिन्होंने कई अपराध किये हैं।

मरियम के निष्कलंक हृदय का सम्मान - सभी लोगों को बतलाओ कि माता मरियम के निष्कलंक हृदय के द्वारा ईश्वर हमें कृपा प्रदान करते हैं। उन्हें बतलाओ कि वे उनसे कृपा प्राप्त करें तथा उनके हृदय के साथ येसु के पवित्र हृदय का भी सम्मान करें।"   

संत पापा जॉन पौल द्वितीय ने 13 मई 2000 को फ्राँसिस एवं जसिन्ता को धन्य घोषित किया और संत पापा फ्राँसिस ने 13 मई 2017 में उन्हें संत घोषित किया।

फातिमा की माता मरियम के ग्रोटो के सामने घुटनों के बाल प्रार्थना करते हुए
फातिमा की माता मरियम के ग्रोटो के सामने घुटनों के बाल प्रार्थना करते हुए

फातिमा में माता मरियम के संदेश को ग्रहण करते हुए हम भी अपने देश और विश्व में शांति के लिए प्रार्थना करें। धन, सम्मान और सत्ता का लोभ व्यक्ति को अंधा बना देता है जिसके कारण अन्याय, शोषण एवं अशांति का राज उत्पन्न होता है। हम इन सभी चीजों के आकर्षण से बचकर रहे और अपने देश एवं समाज में प्रेम, शांति एवं भाईचारा की भावना को बढ़ने दें।

30 August 2019, 17:12