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रोमानिया के ब्लाज में संत पापा का मिस्सा बलिदान रोमानिया के ब्लाज में संत पापा का मिस्सा बलिदान  (ANSA)

प्रेम द्वारा दमनकारी आदर्शों पर जीत

संत पापा फ्रांसिस ने रोमानिया की अपनी तृदिवसीय प्रेरितिक यात्रा के दौरान ब्लाज में स्वतत्रंता की भूमि पर यूखारिस्तीय बलिदान अर्पित करते हुए सात शहीदों को धन्य घोषित किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

रोमानिया, 02 जून 2019 (रेई) “गुरूवर किसने पाप किया था, इस व्यक्ति ने या इसके मां-बाप ने, जो यह मनुष्य जन्म से अंधा हैॽ (यो.9.2) संत पापा ने कहा कि शिष्यों द्वारा येसु से पूछा गया यह सावल असंख्य कार्यों की एक श्रृखंला को जन्म देती और सुसमाचार में स्पष्ट रुप से उस तथ्य को व्यक्त करती है जो मनुष्य के हृदय को अंधा बना देता है।

संत पापा ने कहा कि येसु जन्म से अंधे व्यक्ति को अपने चेलों की तरह देखते हैं। वे उसे स्वीकारते और उसकी ओर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे अपने शिष्यों के लिए इस बात को स्पष्ट करते हैं कि उसका अंधापन किसी के पाप का परिणाम नहीं हैं। वह अपनी थूंक को मिट्टी में सानकर उस व्यक्ति की अंखों में लगाते और उनसे सिलोआम के कुण्ड में जाकर धोने को कहते हैं। ऐसे करने के द्वारा जन्म से अंधा वह व्यक्ति अपनी आंखों की दृष्टि प्राप्त करता है। धर्मग्रंथ में अंधे व्यक्ति की चंगाई महत्वपूर्ण नहीं लगती वरन यह फरीसियों के बीच तर्क-वितर्क, झुनझुलहट और क्रोध उत्पन्न करता है। चंगाई प्राप्त उस व्यक्ति को भीड़ आश्चर्य में सवाल जवाब करती है और उसके बाद फरीसी उसके माता-पिता से पूछताछ करते हैं। वे उस व्यक्ति की पहचान पर सवाल करते, क्योंकि वे ईश्वर द्वारा किये गये कार्य को यह कहते हुए नकारते हैं कि ईश्वर विश्राम दिन में कार्य नहीं करते हैं। वे इतना तक कि इस बात पर भी संदेह करते कि वह व्यक्ति वास्तव में जन्म से अंधा ही नहीं था।

येसु हमारे दुःख-दर्द अतीत को देखते

संत पापा ने कहा कि इस दृश्य में तर्क-विर्तक का उत्पन्न होना येसु के कार्यों को समझने और उनकी प्राथमिकता को देखने में कठिनाई बयां करती है जहाँ येसु एक परित्यक्त व्यक्ति को समाज के केन्द्र-बिन्दु में लाते हैं। इस परिदृश्य में हम लोगों को ईश्वर के प्रेम जिसके फलस्वरुप वह सभों को बचाने की इच्छा रखते हैं “विश्राम दिवस” को अधिक महत्व देने की चर्चा सुनते हैं। (1. तिमथी. 2.4) अंधे व्यक्ति को न केवल अपने अंधेपन में जीवनयापन करना होता वरन वह अपनी इर्द-गिर्द रहने वालों के अंधेपन का भी शिकार होता है। यहां हम विरोध और शत्रुता को पाते हैं जो हमारे हृदय में तब उत्पन्न होता जब हम लोगों को अपना केन्द्र-बिन्दु बनाने के बदले कुछ विशेष रूचियों, सिद्धांतों, अमूर्त बातों, सार और विचारधारों को धारण कर लेते जो अन्य सभी चीजों के संबंध में हमें अंधा बना देता है। लेकिन येसु के कार्य करने का तरीका अपने में अलग है, वे अपने को तटस्थ या किसी अमूर्त आदर्श से प्रभावित नहीं होते बल्कि वे लोगों की आंखों में झांककर देते हैं। वे लोगों के दुःख-दर्द और अतीत को देखते हैं। वे अपने में सीमित नहीं रहते बल्कि उनसे मिलते और जो वास्तव में महत्वपूर्ण है उसे सभों के सामने प्रस्तुत करते हैं।

स्वतंत्रता और करुणा

संत पापा ने कहा कि इस विख्यात देश के नागरिकों को शासन के आर्दशों के कारण कितना दुःख उठाना पड़ा है। उन्हें अपने विश्वास के जीवन, निर्णय लेने की योग्यता, अपनी स्वतंत्रता और सृजनात्मक जीवन जीने के बदले नियमों को अपने वहन करना पड़ा है। एक तरह की सोच रखना और केवल उसके अनुरुप कार्य करने के दबाव ने लोगों में दूसरों के प्रति द्वेष को जन्म दिया, परिणाम स्वरुप कितने निराश्रय मारे गये और कितनी आवाजों के दबा दिया गया। संत पापा ने कहा कि मैं उन ग्रीक-काथलिक धर्माध्यक्षों की याद करता हूँ जिन्हें धन्य घोषित करने की खुशी मुझे है। कठोर शासन व्यवस्था की स्थिति में उन्होंने अपने लोगों के लिए विश्वास और प्रेम का साक्ष्य दिया। अपने अदम्य साहस औऱ अन्तरिक सहन शक्ति के कारण उन्होंने घोर कैद और दुर्रव्यवहार का दंश झेलकर भी कलीसिया के प्रति निष्ठावान बने रहे। इन प्रेरितों, विश्वास के नाम शहीदों ने रोमानिया की जनता हेतु एक कीमती विरासत प्रदान की जिसे हम “स्वतंत्रता और करुणा” की संज्ञा दे सकते हैं।

संत पापा ने कहा कि हम इस दिव्य धर्मविधि को “स्वतंत्रता की भूमि” पर अर्पित कर रहे हैं। यह भूमि अपने में अर्थ से परिपूर्ण है जो हमें एकता में बने रहने हेतु प्रेरित करती है जहाँ हम धार्मिक विभिन्नताओं को पाते हैं। ये सारी चीजों आध्यात्मिक संरक्षण का निर्मांण करती जो रोमानिया की राष्ट्रीय संस्कृति की विशेषता को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। नये धन्य घोषितों ने दुःखों को अपने में वहन किया औऱ मानवाधिकार की रक्षा हेतु आदर्श प्रणाली द्वारा प्रताड़ित होकर अपने जीवन को कुर्बान किया। उस अवधि में ख्रीस्तीय समुदाय की एक कठिन परीक्षा ली गई। सभी धर्माध्यक्षों, ग्रीक-काथलिक और रोम रीति के काथलिक विश्वासियों को धर्म सतावट और कैदखाने की सजा मिली।

साहस में जीवन जीने का आहृवान

नये धन्यों की एक नई आध्यात्मिक विरासत करूणा है। ख्रीस्त के प्रति उनकी निष्ठा को हम उनके जीवन में देख सकते हैं जहाँ उन्होंने अपने प्रतड़ित करने वालों के प्रति कोई दुर्भावना के भाव नहीं रखे बल्कि अपनी बड़ी नम्रता में शहादत हेतु अपने को स्वेच्छा से निछावर कर दिया। संत पापा फ्रांसिस ने बंदीगृह में रहने के दौरान धर्माध्यक्ष इलियु होसु द्वारा उच्चरित शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा, “ईश्वर ने हमें दुःख के इस अंधकार में भेजा है जिससे हम क्षमा को घोषित कर सकें और सभों के मनफिराव हेतु प्रार्थना कर सकें।” ये वचन हमारे लिए उनके मनोभावों को व्यक्त करते हैं जहाँ उन्होंने अपनी परीक्षा की घड़ी में विश्वास का साक्ष्य बिना किसी समझौता या प्रतिशोध की भावना से दिया। करुणा का साक्ष्य जिसे उन्होंने अपने प्रतड़ित करने वालों को दिया वह हमारे लिए प्रेरितिक संदेश है क्योंकि यह आज हम सबों को अपने क्रोध और अक्रोश पर प्रेम और क्षमाशीलता द्वारा विजय प्राप्त करने की मांग करता तथा अपने ख्रीस्तीय विश्वास को निरंतरता और सहास में जीने का आहृवान करता है।

नये आदर्शों का प्रभाव

संत पापा ने कहा कि आज भी हम अपने बीच में नये आदर्शों को पनपता हुआ पाते हैं जो शांतिमय तरीके से अपनी जड़ों को जमाते और हमारे लोगों को अपने धनी संस्कृति और धार्मिक रिवाजों से उखाड़ने की कोशिश करते हैं। निवेश के वे आदर्श मानव-जीवन, विवाह और पारिवारिक मूल्यों को विघटित करते हैं (अमोरिस लेएत्तीसिया 40) और उससे भी बढ़कर अतीत के नास्तिक विचार हमारी संतानों को विखंडित करने के प्रस्ताव स्वरुप आते जहाँ वे अपने जीवन को आधारहीन पाते हैं (क्रिस्तुत विभीत 78)। वे चीजें जो तुरंत हमारे जीवन की इच्छाओं को पूरी नहीं करती अपने में व्यर्थ समझी जाती हैं, जहाँ हम एक-दूसरे का उपयोग और उपभोग केवल वस्तुओं की तरह करते हैं (लौओदतो सी 123-124)। वे आवाजें हमारे जीवन में भय और विभाजन के बीज बोते हुए हमारे इतिहास की अति मूल्यवान विरासत को हमसे दूर जमीन में दफना देने की कोशिश करती हैं। संत पापा ने सन् 1568 में जारी तोरदा के अध्यादेश की याद की जिसके फलस्वरुप यूरोप में कट्टरवाद की थोक-थाम करते हुए धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया गया।     

संत पापा ने अपने प्रवचन के अंत में सभी विश्वासियों को सुसमाचार की ज्योति बनने हेतु प्रेरित किया जैसे की रोमानिया के सात धन्य धर्माध्यक्षगण थे जिन्होंने नई पनपती आदर्शों का विरोध किया। आप स्वतंत्रता और करूणा के साक्षी बनें और विभाजन की जगह भ्रातृत्व और वार्ता को बढ़ावा देते हुए एकता में एक-दूसरे के साथ बने रहें। हमारे इस कार्य में कुंवारी मरियम हमारी सहायता करे और धन्य धर्माध्यक्षगण हमारी इस यात्रा में हमारे साथ चलें।

02 June 2019, 17:00