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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा  

मुक्ति खरीदी नहीं जा सकती, यह एक उपहार है

संत पापा ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में “प्रेरित चरित” पर अपनी धर्मशिक्षा माला की शुरूआत करते हुए कहा कि यह ईशवचन और पवित्र आत्मा के बीच आश्चर्यजनक संबंध की चर्चा करता है। ईशवचन और पवित्र आत्मा को हम दो सजीव और प्रभावकारी नायकों के रूप में पाते हैं।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 15 मई 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को “प्रेरित चरित” पर अपनी धर्मशिक्षा माला की शुरूआत करने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज हम “प्रेरित चरित” पर अपनी धर्मशिक्षा माला की शुरूआत करेंगे। धर्मग्रंथ की इस पुस्तिका का लेखन सुसमाचार लेखक संत लूकस के द्वारा हुआ जो दुनिया में सुसमाचार प्रचार की यात्रा का जिक्र करने के साथ-साथ ईशवचन और पवित्र आत्मा के बीच आश्चर्यजनक संबंध की चर्चा करते हैं जो सुसमाचार प्रचार की शुरूआत करते हैं। प्रेरित-चरित में ईशवचन और पवित्र आत्मा को हम दो सजीव और प्रभावकारी नायकों के रूप में देखते हैं।

ईशवचन और पवित्र आत्मा

संत पापा ने कहा, “ईश्वर दुनिया में अपना संदेश” भेजते और “उनका वचन तीव्रता” से प्रसारित होता है।(स्त्रो.147.4) ईशवचन अपने में क्रियाशील है जो तेजी से फैलता है। यह जहाँ गिरता उस स्थान तो सिंचित करता है। इसकी शक्ति क्या हैॽ संत लूकस हमें बतलाते हैं कि मानव के मुख से निकलने वाला ईश्वर का वचन अपने में प्रभावकारी है जिसके लिए हम पवित्र आत्मा का धन्यवाद करते हैं क्योंकि यह मनुष्य में ईश्वरीय शक्ति का संचार करता है। ईश्वर का वचन अपने में जीवन्त है जो मानव के जीवन को परिशुद्ध करता और उनमें जीवन का स्रोत बनता है। संत पापा ने कहा कि धर्मग्रंथ हमारे लिए मानव के जीवन में ईश्वरीय कार्यों का वृतांत प्रस्तुत करता है। धर्मग्रंथ में हम कहानियों को पाते हैं जो मानव के शब्दों में चर्चित हैं। धर्मग्रंथ और इतिहास की पुस्तिका में क्या अंतर हैॽ धर्मग्रंथ के वचन पवित्र आत्मा से प्रेरित हैं जो हममें शक्ति का संचार करता है वह शक्ति जो हममें पवित्रता के बीज बोता है, एक जीवन का बीज जो प्रभावशाली है। जब वचनों के रुप में पवित्र आत्मा हमारे जीवन में आते तो वे हमारे लिए शक्तिपुंज बन जाते हैं, अर्थात हमारा हृदय प्रज्वलित हो जाता और हम अपने में नयापन का अनुभव करते हैं, यह हमारे जीवन से विभाजन और प्रतिरोध की दीवारों को उड़ा ले जाती, नये राहों को खोलती और ईश प्रजा हेतु सीमाओं का विस्तार करती है। प्रेरित-चरित में हम इन्ही बातों का उल्लेख सुनते हैं।  

यह पवित्र आत्मा है जो नाजुक मानव शब्द को जीवंत सौहार्द और सजीव बना देता है जिसके फलस्वरूप हम अपने जीवन में अपने उत्तरदायित्वों से भागने के बदले अपने कार्यों को भली-भंति करते हैं। उसी आत्मा के द्वारा ईश पुत्र दुनिया में आये, आत्मा ने उन्हें अभिषिक्त कर प्रेरितिक कार्य में संलग्न किया। उन्होंने पवित्र आत्मा से प्रेरित होकर अपने शिष्यों को नियुक्त किया जो उनकी शक्ति से दृढ़ बने रहते, सुसमाचार का प्रचार करते और फल उत्पन्न करते हैं। वही पवित्र आत्मा हमें भी आज सुसमाचार की घोषणा करने में मदद करता है।

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार का अंत येसु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण से होता है और वहीं प्रेरित-चरित की शुरूआत होती है जहाँ वे अपने को पुनर्जीवित येसु की कृपा से सराबोर पाते जिसे वे ईश्वर की कलीसिया संग साझा करते हैं। संत लुकस हमें बतलाते हैं कि येसु अपने दुःखभोग के बाद उन प्रेरितों को बहुत से प्रमाण दिये कि वे जीवित हैं, वह चालीस दिनों तक उन्हें दिखाई देते रहे और उनके साथ ईश्वर के राज्य के विषय में बातें करते रहे।(प्रेरि.1.3) पुनर्जीवित येसु बहुत ही मानवीय रुप में अपने को शिष्यों के बीच पेश करते हैं। वे उन्हें अपने पास बुलाते, उनके साथ भोजन करते और उन्हें विश्वास में अपने पिता द्वारा की गई प्रतिज्ञा की पूर्णतः का इंतजार करने को कहते हैं। पिता की प्रतिज्ञा यही है,“तुम लोगों को पवित्र आत्मा का बपतिस्मा दिया जायेगा”।(प्रेरि.1.5)

मुक्ति का वरदान

पवित्र आत्मा के बपतिस्मा द्वारा, वास्तव में हमें ईश्वर के साथ एक व्यक्तिगत संबंध में प्रवेश करते हैं जिसके फलस्वरुप हमें साहस का उपहार मिलता अर्थात हम अपने को “ईश्वर की संतान” कहते और स्वतंत्र, प्रभावकारी रुप से, येसु ख्रीस्त के प्रेम से पोषित, अपने सभी भाइयों और सारे विश्व की मुक्ति हेतु अपने को समर्पित करते हैं।

संत पापा ने कहा कि ईश्वर के उपहारों को प्राप्त करने हेतु हमें अपने में मेहनत या संघर्ष करने की जरुरत नहीं होती। अपने समय में हमें सारी चीजें स्वतंत्र रुप में दी जाती हैं। येसु हमें सारी चीजों को स्वतंत्र रुप में प्रदान करते हैं। मुक्ति को हम अपने लिए खरीद नहीं सकते हैं इसकी कीमत नहीं है वरन यह हमारे लिए मुफ्त में मिला एक उपहार है। इन घटनाओं की परिपूर्णतः के संबंध में चिंतित येसु अपने चेलों से कहते हैं, “पिता ने जो समय और मुहूर्त अपने निजी अधिकार से निश्चित किये हैं, तुम लोगों को उन्हें जानने का अधिकार नहीं है, किन्तु पवित्र आत्मा तुम लोगों पर उतरेगा और तुम्हें सामर्थ्य प्रदान करेगा और तुम लोग येरुसालेम, सारी यहूदिया औऱ समारिया में तथा पृथ्वी के सीमान्तों तक मेरे साक्षी होंगे।” (प्रेरि.1.7-8)

प्रार्थना और धीरज

येसु अपने चुने हुए लोगों से कहते हैं कि वे अपने वर्तमान समय की चिंता में न जीये लेकिन अपने को समय के साथ संयुक्त करें और ईश्वर के कार्यों पूरा होने की प्रतीक्षा करें। येसु ख्रीस्त अपने लोगों से यह आग्रह करते हैं कि वे अपने प्रेरितिक कार्य की शुरूआत अपने में नहीं करें बल्कि पिता की प्रतीक्षा करें जो पवित्र आत्मा से उनके हृदयों को पोषित करने वाले हैं जिससे वे सारी दुनिया में उनका साक्ष्य दे सकें।

पवित्र आत्मा की प्रतीक्षा में येसु के शिष्य एक परिवार के रुप में अंतिम व्यारी की उस कोठरी में एक साथ जमा थे, जहां की दीवारें पवित्र यूखारीस्त के रुप में मिले येसु के उपहार का साक्ष्य देती हैं। वे प्रार्थना करते हुए अपनी दृढ़ता में बने रहते हैं मानो वे अलग-अलग नहीं वरन एक हों। संत पापा ने कहा कि वास्तव में यह प्रार्थना है जिसके द्वारा हम अपने जवीन के अकेलेपन, परीक्षा, संदेह पर विजय प्राप्त करते और अपने हृदय को एकता हेतु खोलते हैं। माता मरियम की उपस्थिति उस परिस्थिति और अनुभूति को और भी मजबूत बनाती है, शिष्यों ने सर्वप्रथम अपने गुरू से प्रेम में साक्ष्य देने की शिक्षा ग्रहण की और एकता में रहते हुए अपने को भय मुक्त पाया।

हम येसु की प्रतीक्षा करते हुए धैर्य में बने रहने हेतु उनसे कृपा की याचना करें जिससे हम नम्रता और दीनता में उनके कार्यों को पूरा कर सकें, हम पवित्र आत्मा से कलीसिया के संग एकता में बने रहने हेतु निवेदन करें।

इतना कहने के बाद संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सबों के साथ मिलकर “हे पिता हमारे” प्रार्थना का पाठ किया और सभों को अपना प्रेरितिक आर्शीवाद प्रदान किया।

29 May 2019, 16:34