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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (Vatican Media )

हमें परीक्षा में न डाल

संत पापा फ्रांसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के दौरान पिता की करूणा “हमें परीक्षा में न डाल” पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 01 मई 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को “हे पिता हमारे” प्रार्थना पर धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

हम “हे पिता हमारे” प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा को जारी रखते हुए समाप्ति के पहले एक निवेदन में पहुँचते हैं, “हमें परीक्षा में न डाल” (मत्ती. 6.13)। “हे पिता हमारे” प्रार्थना की शुरूआत एक शांतिमय तरीके से होती है जहां हम ईश्वर की योजना को अपने मध्य पूरा होने की आशा करते हैं। इसके बाद हम अपने रोजदिन की जरुरत “प्रतिदिन का आहार” की मांग करते हैं। इसके बाद इस प्रार्थना में हम एक दूसरे के साथ अपने संबंध की ओर देखते जो बहुधा हमारे स्वार्थ के कारण दूषित होता है जिसके लिए हम क्षमा की याचना करते हुए दूसरों को क्षमा देने हेतु प्रतिबद्ध होते हैं। लेकिन इस अंतिम निवेदन के द्वारा हम स्वर्गीय पिता के साथ अपनी वार्ता में प्रवेश करते हैं जहाँ हम अपने को अपनी स्वतंत्रता और बुराइयों के जाल में फांसने से बचे रहने हेतु निवेदन करते हैं।

पिता बच्चों की बुराई नहीं सोचते

संत पापा ने कहा कि जैसे हम जानते हैं कि ग्रीक भाषा से धर्मग्रंथ का आधुनिक हूबहू अनुवाद करना अपने में कठिन है यद्यपि हम सर्वसहमति से एक तथ्य की ओर अपने को क्रेन्दित कर सकते हैं। हमें अपने में इस बात को पृथक करने की आवश्यकता है कि ईश्वर मानव के जीवन में परीक्षाओं को लेकर आते हैं, मानों वे अपने बच्चों के लिए जाल और गड्डे खोद कर रखते हों। उन्होंने कहा कि यह ईश्वर की छवि से अति दूर है जो येसु ख्रीस्त में हमारे लिए प्रकट की गई है। हम इस बात को न भूले की “हे पिता हमारे” प्रार्थना की शुरूआत “पिता” से होती है। और एक पिता अपने बच्चों के लिए गड्डों का निर्माण नहीं करते हैं। ख्रीस्तियों के रुप में हम अपने ईश्वर से ईर्ष्या नहीं करते और न ही ईश्वर मनुष्यों के संग एक प्रतिस्पर्धा में रहते हैं। ईश्वर के ऐसे रुपों को हम गैर-ख्रीस्तीय देवी-देवताओं में पाते हैं। संत याकूब के पत्र में हम पाते हैं, “प्रलोभन में पड़ा हुआ कोई भी व्यक्ति यह न कहे की ईश्वर मुझे प्रलोभन देता है क्योंकि ईश्वर न तो बुराई के प्रलोभन में पड़ सकता और न किसी को प्रलोभन देता है। (याकू. 1.13) ठीक इसके विपरीत पिता अपने में बुराई का स्रोत नहीं जो अपने बच्चों के मछली मांगने पर उन्हें सांप दे।(लूका.11.11) येसु अपनी शिक्षा में हमें कहते हैं कि जब मनुष्य के जीवन में बुराई आती तो वह उसके विरूद्ध युद्ध करता है जिससे वह उससे मुक्त हो सके। ईश्वर हमारे लिए सदैव युद्ध करते हैं वे हमारे विरूद्ध नहीं हैं।

ईश्वर सदा हमारे साथ रहते

संत पापा न कहा कि परीक्षा और प्रलोभन की ये दो परिस्थितियाँ येसु के जीवन में भी रहस्यात्मक रुप से उपस्थित हैं। ईश पुत्र के इन अनुभूतियों में हम उन्हें भाई के रुप में पाते हैं। ईश्वर ने हम सभों को विकट परिस्थितियों में यूं ही नहीं छोड़ दिया है बल्कि उन्होंने अपने बेटे येसु ख्रीस्त में अपने को हमारे लिए प्रकट किया है, “ईश्वर हमारे साथ” हैं। संत पापा ने कहा कि वे हमारे साथ हैं वे हमें जीवन देते, हमारे जीवन की खुशी, मुश्किल, दुःख, पराजय की घड़ी में हमारे साथ रहते, जब हम पाप करते सभी समय हमारे साथ रहते हैं क्योंकि वे एक पिता हैं जो हमें नहीं छोड़ सकते हैं।

येसु शैतान पर भारी हैं

जब हम अपने जीवन में बुराई की ओर अभिमुख होते, भ्रातृत्व की भावना का परित्याग कर सभी चीजों और लोगों पर एकाधिकार करना चाहते हैं तो हम इस बात पर गौर करें कि येसु ख्रीस्त ने इस परीक्षा पर हमारे लिए विजयी पाई है। संत योहन का सुसमाचार हमारे लिए इसकी चर्चा करता है, बपतिस्मा के तुरंत बाद मरूभूमि में शैतान येसु की परीक्षा लेता है। येसु के जनसामान्य जीवन की शुरूआत इस तरह शैतान की परीक्षा द्वारा होती है। शैतान वहाँ उपस्थित था। बहुत से लोग कहते हैं, “हम क्यों शैतान का जिक्र करें वह तो प्राचीन समय की बात हैॽ शैतान का कोई अस्तित्व नहीं है।” संत पापा ने कहा कि सुसमाचार हमें बतलाता है, येसु ने शैतान का सामना किया, शैतान उसकी परीक्षा लेता है। येसु शैतान की सभी परीक्षाओं पर विजयी होते हैं। संत मत्ती का सुसमाचार येसु और शैतान के बीच के परिदृश्य को एक खास चित्रण द्वारा अंत करते हैं, “तब शैतान उन्हें छोडकर चला गया और स्वर्गदूत आकर उनकी सेवा-परिचर्या करते रहे” मती. 4.11)।

येसु हमें खोजते हैं

संत पापा ने कहा कि हमारे जीवन की कठिनतम परिस्थिति में भी ईश्वर हमें अकेले नहीं छोड़ते हैं। गेतसेमानी बारी में प्रार्थना करने के दौरान हम उनके हृदय मे घोर दुःख को देखते हैं। वह अपने में अकेलेपन और परित्यक्त होने का अनुभव करते हैं। वे दुनिया के पापों का भार अपने कंधों पर देखते हैं। इस प्रमाण हमें उनके वचनों में देखने को मिलता है। येसु ने अपने लिए प्रेम की मांग कभी नहीं की किन्तु उस रात उनकी आत्मा मरने की स्थिति में थी और वे अपने मित्रों से सामीप्य की मांग करते हैं, “यहाँ ठहर जाओ और मेरे साथ जागते रहो।” (मत्ती. 26.38) जैसे हम जानते हैं शिष्यगण अपने में भय और निंद्रा से ग्रस्ति थे। अपने दुःख की घड़ी में ईश्वर मानव का साथ चाहते हैं लेकिन मानव अपने में सोते हैं। लेकिन मानव की कठिन परिस्थित में ईश्वर उसके साथ रहते हैं। हमारे जीवन के सबसे बुरे दिनों, कष्टों, दुःखों में ईश्वर हमारे साथ, हमारे निकट रहते और हमारी ओर से युद्ध करते हैं। क्योंॽ क्योंकि वे पिता हैं। पिता अपने बच्चों को नहीं छोड़ते हैं। येसु के उस रात के दुःख और संघर्ष में हम उनकी मानवता को देखते हैं ईश्वर दुःख के गर्त में हमें खोजने आते हैं।

येसु दुःख की घाटी के पार गये

हम अपने दुःख की घड़ी में भी अपने में सहज महसूस करते हैं क्योंकि येसु ने उस दुःख की घाटी को पार किया है जो हमें उनकी उपस्थिति का अनुभव अपने जीवन के दुःखों में कराता है। वे हमारा परित्याग नहीं करते हैं।

इस तरह अपनी धर्मशिक्षा ने अंत में संत पापा ने प्रार्थना करते हुआ कहा कि हे ईश्वर हमारे बीच से प्रलोभन और परीक्षा को दूर कर। तू पिता है हमें यह दिखा कि येसु ने क्रूस का बोझ अपने ऊपर ले लिया है। हम यह बता कि येसु हमें अपने साथ विश्वास और पिता के प्रेम में इस क्रूस को वहन करने का निमंत्रण देते हैं।

01 May 2019, 16:56