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मोरक्को में मिस्सा बलिदान के दौरान संत पापा मोरक्को में मिस्सा बलिदान के दौरान संत पापा  (AFP or licensors)

पिता के हृदय पर चिंतन करें, संत पापा

संत पापा ने मोरक्को की अपनी दो दिवसीय प्रेरितिक यात्रा के अंतिम दिन राबात में मिस्सा बलिदान अर्पित करते हुए पिता की करूणा पर प्रवचन दिया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 1 अप्रैल 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने मोरक्को की अपनी दो दिवसीय प्रेरितिक यात्रा की समाप्ति राबात में मिस्सा बलिदान के साथ की।

उन्होंने चालीसा के चौवथे रविवार हेतु लिए गये सुसमाचार उड़ाव पुत्र के दृष्टांत पर अपना चिंतन प्रस्तुत करते हुए कहा, “वह दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देख लिया और दया से द्रवित हो उठा, उनसे दौड़ कर उसे गले लगा लिया और उसका चुम्बन किया।” (लूका.15.20)

पिता की उत्सुकता

यहां हम बेटे के लौटने पर पिता के व्यवहार को देखते हैं जो सुसमाचार का केन्द्र-बिन्दू है। उसके घर पहुंचने से पहले ही अपनी करूणा में वह दौड़ कर अपने बेटे से मिलने जाता है। वह उसके लौटने पर आनंदित होता है।

संत पापा ने कहा कि पिता अपने बड़े बेटे के पास भी दौड़कर जाता है जिससे वह उसे मना सके क्योंकि उसकी अनुपस्थिति में उसे पूर्ण खुशी की अनुभूति नहीं होगी। लेकिन जेठे लड़के को हम अपने में क्रोधित पाते हैं वह अपने पिता की खुशी को स्वीकार करने हेतु कठिनाई का अनुभव करता है। वह अपने भाई के घर वापस आने को स्वीकार नहीं कर पाता है। उसके लिए उसका भाई अभी भी खोया हुआ है क्योंकि उसने उसे अपने हृदय में खो दिया है।

घर के समारोह में सहभागी होने की मनाही करते हुए वह जेठा लड़का न केवल अपने छोटे भाई को पहचाने में असफल होता है बल्कि वह अपने पिता को भी नहीं पहचान पाता है। वह अपने में अकेला, खुशी के बदले गम में ही रहना चाहता है। वह केवल अपने भाई को क्षमा देने में असमर्थ होता वरन अपने पिता की दयालु को भी स्वीकार नहीं कर पाता है।

हमारे जीवन का परिदृश्य

उस घर के परिदृश्य में हम मानवता के रहस्य को उभर कर आता हुआ देखते हैं। एक ओर खोये बेटे के पाये जाने की खुशी तो दूसरी ओर अपने में छले जाने की अनुभूति के कारण खुशी मनाये जाने पर क्रोध प्रकट करना। खोये बेटे का स्वागत जो अपनी दयनीय दशा में जीवन व्यतीत कर रहा था वही निकम्मा सबित हुए बेटे के आलिंगन से झुंझुलहट और तिरस्कार की भावना।

यहां हम उन सारी बातों को देखते हैं जो हमारे सामाजिक जीवन में रोज दिन होता है जिन्हें हम अपने हृदय की गहराई में अनुभव करते हैं। यह तनाव हमारे जीवन में काईन और हाबिल के समय से ही व्याप्त है। हम सभी इसका सामना करने हेतु बुलाये जाते हैं। हमारे दैनिक जीवन में यह खूनी सवाल सदा लौटकर आता है,“क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँॽ” (उत्पि.4.9)

उड़ाव पुत्र का दृष्टांत हमें अपने अंदर व्याप्त युद्ध और विभाजन की परख करने हेतु निमंत्रण देता है जहाँ हम अपने आदर्शों के अनुसार समाज का निर्माण करने की कोशिश करते हैं, जहाँ हर कोई अपने को पुत्र या पुत्री के रुप में एक सम्मानजनक स्थिति में देखने की चाह रखता है।

पिता का चाह

वही हम उस परिवार के परिदृश्य में पिता की इच्छा को देखते हैं जो बिना शर्त के अपने सभी पुत्र-पुत्रियों को अपने आनंद में सहभागी होने की चाह रखता है। वे चाहते हैं कि कोई भी बेटा या बेटी अपने जीवन के दयनीय स्थिति में, अनाथ, अकेला और परित्यक्त न रहे। वे यही चाहते हैं कि हम सभी अपने में मुक्ति प्राप्त करें। (1तिम.2.4)

यह सच है कि हमारे जीवन में बहुत सारी परिस्थितियाँ ऐसी हैं जो हमें विभाजित करती और हम अपने को युद्ध की स्थिति में पाते हैं। हम अपने जीवन में कई बार इस बात को अनुभव करते हैं कि घृणा और प्रतिशोध अपने में न्यायसंगत है जिसके फलस्वरूप प्रभावकारी ढ़ंग से न्याय की स्थापना की जा सकती है। यद्यपि हमारे अनुभव हमें यही बतलाते हैं कि घृणा, विभाजन और बदले की भावना हमारे लोगों की आत्मा को मार डालती है। यह हमारे बच्चों की आशाओं को विषक्त कर देती औऱ हमारे जीवन की खुशी को नष्ट कर देती है।

हम सभी भाई-बहन हैं

संत पापा ने कहा कि येसु हमें पिता के हृदय पर चिंतन करने का आहृवान करते हैं। केवल ऐसा करने के द्वारा ही हम अपने में इस बात का अनुभव करते हैं कि हम एक दूसरे के लिए भाई-बहन के समान हैं। यदि हम अपनी आंखें रोज दिन स्वर्ग की उठाते हुए “हे पिता” पुकारते तो यह हमें एक दूसरे को शत्रु के रुप में नहीं वरन भाई-बहनों के रुप में देखने हेतु मदद करता है।

जेठे लड़के को पिता कहते हैं, “जो कुछ मेरा है वह सब तुम्हारा है।” (लूका.15.31) वह इसके द्वारा अपने भौतिक धन का जिक्र नहीं करते लेकिन अपने प्रेम को उसके लिए व्यक्त करते हैं जो किसी भी ख्रीस्तीय का सबसे बड़ा धन है। हम ईश्वर के बेटे-बेटियों के रुप में सदैव प्रेम किये जाते हैं जो हमारी सबसे बड़ी निधि है जिसे हमसे कोई छीन नहीं सकता है।

सुसमाचार की खुली समाप्ति

सुसमाचार का दृष्टांत हमारे लिए खुले रुप में अंत होता है। पिता अपने जेठे बेटे से निवेदन करते है कि वह अंदर आते हुए करूणा के समारोह में भाग ले। सुसमाचार लेखक हमें यह नहीं बतलाते कि उसने क्या निर्णय लिया। क्या वह समारोह में शामिल हुआॽ हम अपने में यह देख सकते हैं कि ऐसा खुला इति हममें से प्रत्येक जन को व्यक्तिगत और सामुदायिक रुप में एक दूसरे के साथ संयुक्त होने में मदद करता है। हम इसे अपने मनमाफिक पूरा कर सकते हैं हमारा व्यवहार अपने पड़ोसियों के संग, दूसरों के साथ कैसा है। ख्रीस्तियों के रुप में हम यह जानते हैं कि पिता के घर में बहुत से स्थान हैं लेकिन केवल वही अपने में बाहर रह जाता है जो खुशी में सहभागी होने हेतु अन्दर जाना नहीं चाहता है। 

01 April 2019, 16:57