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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा  

तेरी इच्छा पूरी होवे

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह मेें “हे पिता हमारे प्रार्थना” पर धर्मशिक्षा देते हुए “तेरी इच्छा पूरी होवे” पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 20 मार्च 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को “हे पिता हमारे प्रार्थना” पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

“हे पिता हमारे” प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा माला को जारी रखते हुए आज हम तीसरी पुकार “तेरी इच्छा पूरी होवे” पर अपना चिंतन करेंगे। हम इसे प्रथम दो पुकारों, “तेरा नाम पवित्र किया जावें और तेरा राजा आवे”, से संयुक्त करते हुए देखने की जरूरत है जहाँ हम इसकी पूर्णतः को पाते हैं।

येसु मानव की चिंता करते हैं

संत पापा ने कहा कि मनुष्य द्वारा विश्व की देख-रेख करने के पहले, ईश्वर मनुष्य और संसार की अथक देख-रेख करते हैं। हम पूरे सुसमाचार में इस परिदृश्य का विवरण सुनते हैं। पापी जकेयुस गुलर के पेड़ पर चढ़ जाता है क्योंकि वह येसु को देखना चाहता है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसके बहुत पहले ही वह येसु की नजरों में है। वहां पहुंचने पर येसु जकेयुस से कहते हैं,“जकेयुस जल्दी नीचे उतरो, क्योंकि मुझे आज तुम्हारे घर में ठहरना है।” इस घटना के अंत में येसु कहते हैं, “जो खो गया था, मानव पुत्र उसी को खोजने और बचाने आया है।” (लूका, 19.10) मानव के रुप में अपने पुत्र को दुनिया में भेजते हुए ईश्वर खोये हुए को खोजने और उन्हें बचाने की इच्छा रखते हैं। इस भांति हम अपनी प्रार्थना में यह कहते हैं कि ईश्वर अपनी इस खोज में सफल हों और दुनिया में उनकी मुक्ति योजना पूरी हो। संत पापा ने कहा, “ईश्वर सबसे पहले हमें खोजते हैं और बाद में दुनिया को। वे अपने शर्तहीन प्रेम के कारण हममें से हर एक जन को व्यक्तिगत रूप में खोजते हैं। 

ईश्वर हमारे द्वार को खटखटाते हैं

ईश्वर अपने में अज्ञात नहीं हैं, वे पहेली नहीं और न ही वे दुनिया के लिए अपनी मुक्ति योजना को समझ से परे निर्धारित करते हैं। यदि हम इसे अपने जीवन में नहीं समझते तो हम अपने में “हे पिता हमारे” प्रार्थना की तीसरी पुकार के अर्थ को नहीं समझते हैं। वास्तव में धर्मग्रंथ बाईबल में हम दुनिया के लिए ईश्वरीय योजना को सकारात्मक रुप से भरा हुआ पाते हैं। काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा (2821-2827) में हम उन सारे उदृरणों को पाते हैं जहाँ विश्वासियों हेतु दैवीय धैर्यपूर्ण योजना की चर्चा की गई है। संत पौलुस तिमथी के नाम अपने पहले पत्र में इसी चर्चा करते हैं, “ईश्वर की इच्छा यही है कि सभी मनुष्य ईश्वर को जानें और मुक्ति प्राप्त करें।” (2.4) निःसंदेह यह ईश्वर की इच्छा है जहाँ वे हर मानव की मुक्ति चाहते हैं। संत पापा ने कहा, “वे हमारे हृदय के द्वार को खटखटाते हैं जिससे वे हमें अपनी ओर आकर्षित कर सकें और हमें मुक्ति के मार्ग में ले चलें। वे हमारे साथ रहते और हमारा हाथ पकड़ कर अपने साथ ले चलते हैं।”

ईश्वर की इच्छा, शांति स्थापना

अतः “हे पिता हमारे” की प्रार्थना वास्तव में, पिता के उन संतानों की प्रार्थना है जो निश्चित रुप से अपने पिता के हृदय और उनकी प्रेमपूर्ण योजना को जानते हैं। यह गुलामों की प्रार्थना नहीं है वरन स्वतंत्र संतानों की प्रार्थना है जिन्हें वे प्रेम करते हैं। धिक्कार हमें यदि हम इस प्रार्थना को उच्चरित करते हुए अपने कंधों को समर्पण की मुद्रा में झुकाते लेकिन अपने में परिर्वतन नहीं लाते हैं। यह वह प्रार्थना है जिसके द्वारा हम ईश्वर में अपने सुदृढ़ विश्वास को घोषित करते जो हमारी भलाई चाहते हैं, हमें जीवन देते और हमें मुक्ति प्रदान करते हैं। यह एक साहसिक प्रार्थना है जहाँ हम अपने को जूझारू पाते हैं क्योंकि दुनिया में बहुत सारी चीजें हैं जो ईश्वरीय योजना के अनुरूप नहीं हैं। इसायस नबी को उद्धृत करते हुए हम कह सकते हैं, “हे पिता, यहाँ  युद्ध, शक्ति का दुरुपयोग, शोषण है; लेकिन हम जानते हैं कि आप हमारा भला चाहते हैं, इसलिए हम आपसे विनती करते हैं: आपकी इच्छा पूरी हो! हे प्रभु, दुनिया की योजनाओं को बदल दें, तलवारों को हल और भालों को हंसिया में बदल दें, जिससे युद्ध-विद्या की शिक्षा समाप्त हो जायें। (इसा. 2.4) ईश्वर दुनिया में शांति स्थापित करना चाहते हैं।

विश्वास कोई संयोग नहीं

संत पापा फ्रांसिस ने कहा, “हे पिता हमारे” वह प्रार्थना है जो हमारे हृदयों को येसु के प्रेम से प्रज्जवलित करता है, जहाँ हम येसु की भांति पिता की इच्छा पूरी करने की चाह रखते हुए, उनके प्रेम से प्रदीप्त होकर दुनिया को बदलना चाहते हैं। एक ख्रीस्तीय अपरिहार्य “भाग्य” पर विश्वास नहीं करता है। ख्रीस्तीय विश्वास में हम कोई संयोग नहीं पाते हैं बल्कि इस विश्वास में हम सभों के लिए मुक्ति है जो हमारी प्रतीक्षा कर रही होती है जहाँ हम अनंत जीवन में प्रवेश करते हैं। इस भांति यदि हम प्रार्थना करते हैं तो यह हमारे विश्वास को दिखलाता है जहाँ ईश्वर सच्चाई की स्थापना कर सकते और करने की चाह रखते हैं, वे बुराइयों पर विजयी होते हुए अच्छाइयों को स्थापित करते हैं। ऐसे ईश्वर पर हमारा विश्वास करना अर्थपूर्ण होता है और हम अपने जीवन की कठिनतम परिस्थिति में भी अपने को उनके हाथों में सौंप देते हैं।

संत पापा ने कहा, “गेतसेमानी बारी में येसु की स्थिति इसी प्रकार थी, जब उन्होंने अपने में घोर दुःख का अनुभव किया और प्रार्थना करते हुए कहा, “हे पिता यदि हो सके तो यह प्याला मुझ से टल जाये, लेकिन मेरी इच्छा नहीं बल्कि तेरी इच्छा पूरी हो।” (लूका. 22.42) येसु अपने को दुनिया के दुःख से कुचला हुआ पाते हैं लेकिन विश्वास में बने रहते हुए वे अपने को पिता के प्रेमपूर्ण सागर में, उनकी इच्छा के अनुरूप सौंप देते हैं। शहीद भी अपने दुःख की घड़ी में मृत्यु की परवाह किये बिना पुनरूत्थान की चाह रखते हैं। ईश्वर अपने प्रेम में हमें जीवन के कठिन मार्ग में अग्रसर होने देते हैं जिससे हम दर्द और कांटों का अनुभव करें लेकिन वे हमें कभी नहीं छोड़ते हैं। वे हमारे साथ, हमारे अंदर हमेशा रहते हैं। एक विश्वासी के लिए यह एक अनुभव से बढ़कर विश्वास की एक सुदृढ़ता को दिखलाता है। संत लूका रचित सुसमाचार के दृष्टांन में येसु हमें प्रार्थना की इसी निरंतरता को बतलाते हुए कहते हैं, “क्या ईश्वर अपने चुने हुए लोगों के लिए न्याय की व्यवस्था नहीं करेगा, जो दिन-रात उसकी दुहाई देते रहते हैंॽ क्या वह उनके विषय में देर करेगाॽ मैं तुम से कहता हूँ-वह शीघ्र ही उनके लिए न्याय करेगा। (लूका, 18.7-8)

यह हमारे प्रति ईश्वर का प्रेम है। इतना कहने के बाद संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सबों को एक साथ मिलकर “हे पिता हमारे” प्रार्थना करने हेतु आहृवान किया। 

20 March 2019, 16:14