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आमदर्शन समारोह के दौरान धर्मशिक्षा देते संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान धर्मशिक्षा देते संत पापा  (AFP or licensors)

ईश्वर के समय में हर प्रार्थना पूर्ण होती है

आज की धर्मशिक्षा जो संत लूकस रचित सुसमाचार से लिया गया है। वास्तव में, यह सुसमाचार येसु के बचपन की घटनाओं से शुरू करते हुए ख्रीस्त की छवि को एक प्रार्थनामय वातावरण में प्रस्तुत करता है। इसमें तीन भजन हैं जिनको कलीसिया हर दिन अपनी प्रार्थना में शामिल करती है ˸ जकारिया का भजन, मरिया का भजन एवं सिमेयोन का भजन।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 9 जनवरी 2019 (रेई)˸ संत पापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन के पौल षष्ठम सभागार में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को "हे हमारे पिता" की प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा को आगे बढ़ाते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

आज की धर्मशिक्षा जो संत लूकस रचित सुसमाचार से लिया गया है। वास्तव में, यह सुसमाचार येसु के बचपन की घटनाओं से शुरू करते हुए ख्रीस्त की छवि को एक प्रार्थनामय वातावरण में प्रस्तुत करता है। इसमें तीन भजन हैं जिनको कलीसिया हर दिन अपनी प्रार्थना में शामिल करती है ˸ जकारिया का भजन, मरिया का भजन एवं सिमेयोन का भजन।  

येसु प्रार्थना के व्यक्ति  

येसु सबसे पहले एक प्रार्थना के व्यक्ति हैं। उदाहरण के लिए, संत लूकस के वृतांत में, रूपांतरण की घटना प्रार्थना के समय हुई। "प्रार्थना करते समय ईसा के मुखमण्डल का रूपान्तरण हो गया और उनके वस्त्र उज्जवल हो कर जगमगा उठे।  वास्तव में, येसु के जीवन के हर कदम पवित्र आत्मा से प्रेरित थे जो उन्हें उनके हर कार्य में मार्गदर्शन देता था। येसु ने यर्दन नदी में बपतिस्मा लिया, अधिक महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पूर्व पिता से बातें की, वे बहुधा भीड़ से दूर एकान्त में चले जाते थे, उन्होंने पेत्रुस के लिए प्रार्थना की जो थोड़े दिन बाद उन्हें अस्वीकार करने वाला था। ''सिमोन! सिमोन! शैतान को तुम लोगों को गेहूँ की तरह फटकने की अनुमति मिली है, परन्तु मैंने तुम्हारे लिए प्रार्थना की है, जिससे तुम्हारा विश्वास नष्ट न हो।"  (लूक. 22,31-32) यहाँ तक कि मसीह की मृत्यु भी एक प्रार्थनामय महौल में हुई। दुःखभोग की घड़ी में वे आश्चर्यजनक रूप से शांत बने रहे। उन्होंने येरूसालेम की रोती हुई स्त्रियों को सांत्वना दिया, अपने को क्रूस पर चढ़ाने वालों को माफ कर दिया, भले डाकू से स्वर्ग की प्रतिज्ञा की तथा यह कहते हुए अंतिम सांस लिया, "हे पिता मैं अपनी आत्मा तेरे हाथो सौंप देता हूँ।"

येसु की प्रार्थना सबसे बढ़कर हिंसक मनोभाव एवं बदले की भावना को मिटा सकती है तथा सबसे दुखद शत्रु, मृत्यु के साथ समझौता कर सकती है।  

ईश्वर हमारी आवश्यकताओं को जानते हैं

संत लूकस रचित सुसमाचार में ही हम पाते हैं कि उनके एक शिष्य येसु से प्रार्थना करने सिखलाने की अर्जी करते हैं। (11,1). इसी अर्जी से एक महत्वपूर्ण शिक्षा आती है जिसमें येसु अपनों को सिखलाते हैं कि ईश्वर से प्रार्थना करने के लिए किस तरह के शब्दों और मनोभावों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

इस शिक्षा के पहले भाग में पिता से प्रार्थना की गयी है जिसको लूकस एक ऐसे रूप में प्रस्तुत करते हैं जो सुसमाचारक मती से अधिक विस्तृत नहीं है और धर्मविधि में अधिक प्रयोग किया जाता है। एक ख्रीस्तीय ईश्वर को पिता कहकर पुकारता है। संत लूकस के अनुसार "हमारे" तथा "तू जो स्वर्ग में है" अनुपस्थित है। तथापि प्रार्थना का रूप नहीं बदलता है। इस शिक्षा में येसु अपने शिष्यों को जो निर्देश प्रदान करते हैं वह रूचिकर है। वे प्रार्थना करने वालों के मनोभाव पर जोर देते हैं। वे वहाँ एक मित्र का दृष्टांत सुनाते हैं जो अपने मित्र को उसके पूरे परिवार के साथ रात में सोते वक्त परेशान करता है क्योंकि उसके पास अचानक एक मित्र लम्बी यात्रा तय कर आया है और उसे खिलाने के लिए उसके पास रोटी नहीं है। येसु कहते हैं, "मैं तुम से कहता हूँ-वह मित्रता के नाते भले ही उठ कर उसे कुछ न दे, किन्तु उसके आग्रह के कारण उठेगा और उसकी आवश्यकता पूरी कर देगा।" (लूक.11,8) उसके तुरन्त बाद येसु पिता का उदाहरण देते हैं जो बुरे होने पर भी अपने भूखे बेटे को मछली के बदले सांप नहीं दे सकता।

अनसुनी प्रार्थनाएँ

इस शब्दों के द्वारा येसु समझाते हैं कि ईश्वर हमेशा उत्तर देते हैं, उनसे की गयी कोई भी प्रार्थना अनसुनी नहीं जाती। वे एक पिता हैं और वे अपने पीड़ित पुत्रों के दुःखों को नहीं भूल सकते। निश्चय ही, ये वाक्य हमें संकट में डाल सकता है क्योंकि हमारी कई प्रार्थनाएँ अनसुनी प्रतीत होती हैं। हम कितनी बार मांगते किन्तु नहीं मिलता। कितनी बार हम द्वार खटखटाते किन्तु द्वार नहीं खुलता? ऐसे क्षणों में येसु हमें कहते हैं कि हम प्रार्थना करना न छोड़ें। प्रार्थना हमेशा बदलाव लाता है। यदि हम हमारे आसपास नहीं बदल सकते तो अपने आप में बदलाव लायें। येसु उन सभी लोगों को पवित्र आत्मा प्रदान करते की प्रतिज्ञा करते हैं जो प्रार्थना करते।

ईश्वर के समय में

हम निश्चित रूप से स्वीकार कर सकते हैं कि ईश्वर उत्तर देते हैं। केवल समय में अनिश्चितता हो सकती है किन्तु हमें संदेह नहीं करना चाहिए। हमें जीवन भर इंतजार करना पड़ सकता है फिर भी यह निश्चित है कि वे उत्तर देंगे। उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि वे उस पिता के समान नहीं हैं जो मछली के बदले अपने बेटे को सांप देता हो। इस बात से अधिक निश्चित कुछ भी नहीं है कि हमारे हृदय में खुशी की चाह एक दिन जरूर पूर्ण हो जायेगी। येसु कहते हैं, "क्या ईश्वर अपने चुने हुए लोगों के लिए न्याय की व्यवस्था नहीं करेगा, जो दिन-रात उसकी दुहाई देते रहते हैं? क्या वह उनके विषय में देर करेगा?" यह क्या ही महिमा एवं पुनरूत्थान का दिन होगा। अब तक हमारी प्रार्थना अकेलापन एवं निराशा पर विजय पाने के लिए है जो कहानी की धारा में सृष्टि के हर टुकड़े को देखने जैसा है जिसे हम कभी-कभी समझ नहीं पाते किन्तु यह आगे की ओर बढ़ रही है तथा हर रास्ते के अंत में पिता अपनी खुली बाहों से सभी का इंतजार कर रहे हैं।

यह कहते हुए संत पापा फ्राँसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासी समुदाय का अभिवादन किया, खासकर, उन्होंने अमरीका से आये तीर्थयात्रियों का अभिवादन किया।

अंत में, संत पापा ने सभी विश्वासियों और उनके परिवारों पर प्रभु येसु ख्रीस्त के आनन्द एवं शांति की कामना करते हुए, हे हमारे पिता प्रार्थना का पाठ किया और सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

09 January 2019, 14:33