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सिनॉड में युवा सिनॉड में युवा  (ANSA)

युवाओं की आशा, कलीसिया उन्हें सुने और साक्ष्य दे

"युवा, विश्वास एवं बुलाहटीय आत्मजाँच" पर धर्माध्यक्षीय धर्मसभा के दूसरे दिन सभा की शुरूआत साक्ष्य से हुई जिसके बाद सिनॉड के धर्माचार्यों ने इंस्त्रुमेनतुम लावोरिस के पहले भाग पर चिंतन किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

प्रेस ब्रीफिंग में बतलाया गया कि सिनॉड सभागार में "सुनना" शब्द को बार-बार दुहराया गया। कलीसिया के लिए सुनना कोई सामाजिक या शैक्षणिक परीक्षण नहीं है बल्कि लोगों के साथ होने का एक तरीका है। सुनने के द्वारा ही कलीसिया, युवा जगत की चुनौतियों एवं अवसरों को समझ सकती है। प्रस्तुत साक्ष्य के अनुसार आज युवा वार्ता, प्रमाणिकता और सहभागिता की खोज कर रहे हैं, वे सुने जाने तथा बौद्धिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक रूप से बेहतर समझ हेतु प्रेरित किये जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इसी स्थिति में उन्हें सुसमाचार प्रचार के सजीव साक्ष्य की आवश्यकता है।  

युवा व्यक्ति, ईश्वर का स्थान

धर्माध्यक्षीय धर्मसभा के दूसरे दिन का दूसरा मुख्य मुद्दा था, "कहाँ" सुना जाना चाहिए। जिसका उत्तर था कलीसिया में। इसके लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि कलीसिया युवाओं का इंतजार न करे कि वह उसके पास आये, बल्कि वह स्वयं युवाओं के पास आये, खासकर, एक युवा आप्रवासी, युवा खिलाड़ी अथवा बहिष्कृत युवा के पास, जो निराशवादी हैं, जो फेंक देने की संस्कृति के शिकार हैं। इस तरह पल्ली फिर एक बार मुलाकात का स्थल बन जाएगा ताकि कलीसिया युवाओं को सुन सके, उनकी नजरों में नजर मिलाकर देख सके तथा उनके भविष्य के लिए उत्तर दे सके। ऐसा कर पाने के लिए हमें कलीसिया में नया मनोभाव लाने की आवश्यकता है जो विश्वास, सामीप्य, आशा, वार्ता एवं प्रेरिताई से प्रेरित हो।

सिनॉड के धर्माचार्यों ने कहा कि युवा ईश्वर के व्यक्ति हैं क्योंकि ईश्वर उनमें उपस्थित रहते हैं अतः उन्होंने एक-दूसरे का आह्वान किया कि वे जीवन एवं विश्वास का साक्ष्य दें जिसमें अधिक सच्चाई हो। इस विश्वासनीयता के द्वारा, युवा वास्तव में कलीसिया का निर्माण नहीं करते बल्कि कलीसिया बनते हैं। उनकी दृष्टि भविष्य की ओर बढ़ती है जो असीम है, वास्तव में, पौढ़ रक्षा करते हैं जबकि युवा गतिशीलता लाते हैं। अतः युवाओं को सुनने की मांग उनकी गहरी आकांक्षाओं को समझने की मांग है क्योंकि जब कलीसिया युवाओं को स्वीकार करती है, तब वह आपसी कुशलता के कारण बदलती तथा विकसित होती है किन्तु कलीसिया द्वारा, सच्चा रूप नहीं दिखा पाने के बहाने ने परिवारों, धर्मप्रांतों और धर्मसंघों में बुलाहट उत्पन्न करना छोड़ दिया है। एक शिष्य के रूप में येसु के अनुसरण की मांग को पूरा करने के लिए सुसमाचार से अधिक सुन्दर कुछ भी नहीं हैं। कई पुरोहित एवं विश्वासी हैं जो अपने मिशन को खुशी के साथ आगे ले रहे हैं और यही भविष्य का चिन्ह है, युवा इसे जानते हैं। कलीसिया इन्हीं चीजों को उनके सामने रखे और कहे कि लोगों के कारण वे येसु का परित्याग न करें, कलीसिया को न छोड़ दें और उन्हें विश्वास में अधिक दृढ़ होने में मदद करें।

परिवारों को पुनः स्थापित करना एवं आप्रवासियों की रक्षा 

धर्मसभा में परिवार की बुलाहट पर भी प्रकाश डाला गया जो विश्वास को हस्तांतरित करने की प्राथमिक इकाई है क्योंकि इसी में प्रेम, भरोसा, वार्ता, क्षमा आदि भावनाओं को पनाह मिलती है। सिनॉड में विस्थापितों पर भी विचार किया गया जिनके नाबालिग यौन दुराचार एवं शोषण के शिकार होते हैं। मेजबान देशों में उनके एकीकरण के लिए विश्वास, शिक्षा एवं संस्कृति मौलिक चीजें हो जाती है इसलिए कलीसिया को उनकी मदद करनी चाहिए। आप्रवासी भी कलीसिया को मदद कर सकते हैं, अपने साथियों की असुरक्षा एवं आकांक्षाओं को बेहतर रूप से समझने में।

इसके अलावा, कई बच्चे अपने परिवार से अलग होकर जीते हैं, वे काम की खोज में दूसरे शहरों की ओर पलायन करते हैं और यह इस बच्चों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है कि याजक सचमुच उन बच्चों के लिए पिता के समान हों। 

दुराचार एक अपराध है कलीसिया में उसका कोई स्थान नहीं

सिनॉड के धर्माध्यक्षों ने एक अन्य विषय पर विचार किया, वह है यौन दुराचार जो एक अपराध है और जो कलीसिया के प्रति युवाओं के विश्वास को घटाता है उसे कलांकित करता है। कलीसिया को चाहिए की वह युवाओं के सभी सवालों को साहस एवं ईमानदारी के साथ सुने। उन्होंने कहा कि धर्माध्यक्षों की कमजोरियों के लिए क्षमा मांगने तथा दुराचार के कार्यों के लिए सही जवाब देना तथा युवाओं की रक्षा हेतु हर संभव प्रयास करना।

कामुकता पर चिंतन की आवश्यकता

धर्माध्यक्षों ने कामुकता के संदर्भ में कहा कि यह ईश्वर का वरदान है जिसपर युवा कलीसिया से एक रचनात्मक शब्द की मांग करते हैं जो कि आवश्यक है। कामुकता को अनदेखा अथवा अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

05 October 2018, 16:11