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संत याकुब महागिरजाघर में संत पापा फ्राँसिस संत याकुब महागिरजाघर में संत पापा फ्राँसिस  (Vatican Media)

रीगा के संत याकुब महागिरजाघर में संत पापा का अभिवादन

सोमवार 24 सितम्बर को रीगा स्थित संत याकुब काथलिक महागिरजाघर के प्रमुख द्वार पर महागिरजाघर के पल्ली पुरोहित ने आशीष जल और क्रूस के साथ संत पापा फाँसिस का स्वागत किया।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

रीगा, सोमवार, 24 सितम्बर 2018 (रेई) :  संत पापा फ्राँसिस ने संत याकुब काथलिक महागिरजाघर में महाधर्माध्यक्ष के स्वागत भाषण और वर्तमान परिस्थिति के स्पष्ट विश्लेषण के लिए धन्यवाद दिया।

संत पापा ने कहा, “संत याकुब को समर्पित इस महागिरजाघर में उपस्थित बुजुर्ग भाइयों और बहनों की मौजूदगी मुझे प्रेरित संत याकूब के पत्र के दो वाक्यांशों की याद दिलाती है। शुरुआत में और उसके पत्र के अंत में, दो अलग-अलग शब्दों का उपयोग करने के बावजूद, वे हमें दृढ़ बने रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मुझे यकीन है कि हम इस संदेश की सराहना करेंगे जिसे प्रभु येसु के भाई याकूब, हमें सुनाना चाहते हैं।”

महाधर्माध्यक्ष ने बताया कि यहाँ उपस्थित आप में बहुत लोगों ने युद्ध, राजनीतिक दमन, उत्पीड़न और निर्वासन का दुःखद अनुभव किया है। युद्ध कितना डरावना था, फिर भी आप दृढ़ बने रहे; आप विश्वास में दृढ़ रहे। न तो नाजी शासन, न ही सोवियत शासन आपके विश्वास को तोड़ सका। न ही वे पुरोहितों, धर्मबहनों, प्रचारकों के रुप में कलीसिया की सेवा करने से रोक पाये। आपने अपने जीवन को खतरे में डाला था। आपने अच्छी लड़ाई लड़ी; आप दौड़ पूरी कर चुके हैं, और आप पूर्णरुप से ईमानदार रहे। (सीएफ 2 तिमथी 4:7)

सहनशीलता और धैर्य के साथ इन्तजार 

संत याकूब ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वास में स्थिरता द्वारा सभी परीक्षाओं पर विजय पायी जा सकती है। हालंकि आपका कार्य उन दिनों पूर्णता हासिल किया था आज के परिवेश में भी आपका कार्य पूर्णता को हासिल करने में सक्षम होना चाहिये। आपने अपने शरीर और आत्मा को देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित किया था, अब अक्सर खुद को इससे अलग कर देते हैं। एेसा प्रतीत होता है कि आजकल आजादी के नाम पर अपने बुजुर्गों को अकेले, निसहाय और गरीबी में जीने के लिए छोड़ दिया जाता है। यदि ऐसा है तो स्वतंत्रता और प्रगति उन लोगों के लिए समाप्त हो गई जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ी थी। उन्हें शब्दों से सम्मान तो मिला पर दैनिक जीवन में उन्हें भुला दिया गया। (एवांजली गौदियुम 234)

सतत् प्रयास

 संत याकूब कहते हैं कि आप निरंतर प्रयत्न करते रहें और कभी पीछे न हटें। "इस यात्रा में, जो भी अच्छा है, आध्यात्मिक जीवन में प्रगति और प्यार में वृद्धि है वह बुराई को असंतुलित करने का सबसे अच्छा साधन है" (गौदाते एत एक्सुलताते, 163)। निराशा या दुःख की खेती न करें। अपनी आशा को कभी कम न होनें दें और न ही विनम्रता को खोएं।

संत पापा ने कहा कि संत याकूब अपने पत्र के अंत में धैर्य नहीं खोने हेतु प्रोत्साहित किया।(5:7)  संत याकूब ने यहाँ धैर्य को दो अर्थों में प्रयोग किया है, सहनशीलता और धैर्य के साथ इन्तजार करने में। संत पापा ने उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कहा, “अपने परिवारों और आपकी मातृभूमि में आप इन दोनों दृष्टिकोणों का एक उदाहरण बनें : धीरज से चिह्नित सहनशक्ति और धैर्य के साथ इन्तजार।

इन वर्षों की लम्बी अवधि में, आप विपत्ति का मुकाबला दृढ़ता के साथ करने का साक्ष्य देते आ रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी को यह याद दिलाने की आपकी प्रेरितिक जवाबदेही बनती है कि हमसे आगे जो चले गये हैं उन्हें ईश्वरीय प्रेम और गरिमा प्राप्त है। उनका क्रंदन ईश्वर के पास पहुँच जाता है जब उनकी उपेक्षा की जाती है।

मूल को न भूलें

संत पापा ने कहा,“वर्षों की लम्बी अवधि के कारण, यह न भूलें कि आप लोग जड़ें हैं, जड़ों की नई टहनियों को बढ़ने और फल देने की आवश्यकता है। उन जड़ों को सुरक्षित रखें; उन्हें जीवित रखें, ताकि बच्चों और युवाओं को उनके ऊपर गढ़ा जा सके और उन्हें यह समझाना होगा कि "पेड़ पर फल फूल लगने के लिए पृथ्वी के अंदर की जड़ों से शक्ति लेना पड़ती है।" (एफ एल बर्नेरडेज़, सोन्नेट सी पैरा रिकोब्रा लो रिकोब्राडो)।

इस महागिरजाघर के उपदेश-मंच पर लिखे गए शब्द कहते हैं: "ओह! यदि तुम आज उसकी यह वाणी सुनो, अपना हृदय कठोर न कर लो,” (स्तोत्र 95: 7-8)। एक कठोर दिल वह है जो ईश्वर की निरंतर नवीनता के आनंद का अनुभव नहीं कर सकता। संत पापा ने सभी से जीवन के अंतिम दिनों तक ईश्वर के प्रेम और भलाई का अनुभव करने के लिए अपने हृदय को युवा बनाये रखने की प्रेरणा दी।(सीएफ, स्तोत्र  34: 9)।

24 September 2018, 16:57