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ताल्लिन मेें संत पापा का मिस्सा बलिदान ताल्लिन मेें संत पापा का मिस्सा बलिदान  (Vatican Media)

हम ईश्वर की पवित्र प्रजा बनें

संत पापा फ्रांसिस ने बाल्टिक देशों की अपनी चार दिवसीय प्रेरितिक यात्रा के चौथे और अंतिम दिन एस्तोनिया के ताल्लिन स्वतंत्रता के प्रांगण में मिस्सा बलिदान अर्पित करते हुए ईश्वर की पवित्र प्रजा बनने का संदेश दिया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के प्रथम पाठ में हम गुलामी से मुक्त हुई यहूदी जनता के बारे सुनते हैं जो सिनाई पर्वत पहुँची। अपने लोगों ने बारे में नहीं सोचना हमारे लिए असंभव लगता है। यह हमारे लिए असंभव है कि हमें अपने पूरे देश एस्तोनिया और बाल्टिक देशों के बारे में न सोचें। हम अपने लोगों के बारे में कैसे न सोचें जो दो मिलियन की संख्या में, मानव श्रृंखला के रुप में विलनियस तक फैले हैं। आप अपने जीवन में स्वतंत्रता के संघर्ष का अर्थ समझते हैं जो आप को अपने लोगों के साथ संयुक्त करते हुए एक पहचान प्रदान करती है। अतः ईश्वर के द्वारा मूसा को दिया गया संदेश हमारे लिए उचित जान पड़ता है जिसके फलस्वरूप हम अपने जीवन में आत्मा-जाँच कर सकते हैं कि एक देश के रुप में ईश्वर हमें क्या कहते हैं।

धर्मग्रंथ में चुनी हुई प्रजा

सिनाई पर्वत पहुँची इस्रराएली प्रजा अपने ईश्वर के प्रेम को उनके चमत्कारों के रुप में पहले ही देख चुकी थी। वे ईश्वर के साथ एक प्रेम के विधान में प्रवेश करते हैं क्योंकि ईश्वर ने सर्वप्रथम उन्हें अपना प्रेम प्रर्दशित किया। संत पापा ने कहा कि वे अपनी ओर से ऐसा नहीं करते क्योंकि ईश्वर हमें अपनी स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। एक ख्रीस्तीय के रुप में हम अपने में इस बात को जानते हैं कि ईश्वर की प्रतिज्ञा हमारे जीवन से किसी चीज को नहीं ले जाती है वरन् यह हमारी इच्छाओं को पूरा करती है। कुछ लोग अपने जीवन में सोचते हैं कि अपने को ईश्वर से दूर रखते हुए अपने में स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं। ऐसा करने में उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता है कि वे इस तरह अपने में एक अनाथ-सा, गृहविहीन जीवनयापन करते हैं। “वे अपने में तीर्थयात्री नहीं रह जाते और यहाँ-वहाँ भटकते हुए कहीं नहीं पहुंचते हैं।(एभजेली गैदियुम 170)

हमारे आत्मविश्वास का आधार

संत पापा ने कहा कि इन दिनों लोगों की शक्ति का मापदण्ड वस्तुओं से होता है। कुछ लोग अपने लिए ऊंची आवाज में, निःसंदेह और बिना घबराहट के बातें करते हैं, जो उन्हें अपने में आत्मविश्वास का एहसास दिलाता है। दूसरे चिल्लाते औऱ हथियारों का उपयोग करते हुए धमकी देते हैं, जो उन्हें शक्तिशाली होने का एहसास दिलाता है। लेकिन यह ईश्वर की इच्छा को अपने जीवन में पहचाना नहीं वरन् दूसरों पर रोब जमाने हेतु शक्ति का उपयोग है। मावन के ये मनोभाव नौतिकता को अस्वीकार करता है जो कि ईश्वर का परित्याग है। नौतिकता हमें ईश्वर की ओर अभिमुख करती जो हमें अपनी स्वतंत्रता में विश्व के लिए निष्ठापूर्ण कार्यों को करने हेतु प्रेरित करती है। आप ने यह स्वतंत्रता इसलिए नहीं पाई कि आप अपने को भौतिकतावाद, व्यक्तिवाद या शक्ति की भूख अथवा अधिकार का गुलाम बनायें।

हम येसु के पास आयें

संत पापा ने कहा कि ईश्वर हमारे जीवन की आवश्यकताओं को जानते हैं जिसे हम बहुधा अपने में छुपाने की कोशिश करते हैं। वे हमारी कमजोरियों को जानते हैं जिन्हें हम शक्ति के द्वारा छुपाने की कोशिश करते हैं। आज सुसमाचार में येसु हमें इस बात के लिए प्रोत्साहित करते हैं कि हम उनके पास आयें जिससे हम अपने हमारे हृदय की प्यास को बुझा पायें। यह वे हैं जो हमें जीवन जल प्रचुर मात्रा में प्रदान करते हुए हमारी प्यास बुझते और हमें जीवन की पूर्णतः प्रदान करते हैं। विश्वास का अर्थ हमारे लिए यह है कि हम उस बात का अनुभव करें कि वे जीवित हैं और हमें प्रेम करते हैं। वे हमारा परित्याग नहीं करते वरन् हमारे जीवन के रहस्यों को, हमारे इतिहास को जानते हैं। वे अपनी शक्ति और अद्वितीय क्रियाशीलता के कारण हमारे जीवन की कमजोरियों को ही हमारी शक्ति बना देते हैं।

मरूभूमि में इस्राएलियों ने अन्य देवी-देवताओं की खोज की, सोने के बछड़े की आराधना करते हुए स्वयं की शक्ति पर विश्वास किया। लेकिन ईश्वर ने सदैव उन्हें अपनी ओर आने हेतु प्रेरित किया और उन्होंने पर्वत पर जो कुछ देखा उन सारी बातों पर विश्वास किया। उसी इस्रराएली जनता की तरह हम भी ईश्वर की चुनी हुई प्रज्ञा, एक पुरोहित वर्ग, अपने में पवित्र हैं।(नि.19.6, 1 प्रेत्रु.2.9) यह पवित्र आत्मा है जो हमें इन बातों की याद दिलाता है।(यो.14.26)

गरूढ़ की तरह चिंता

संत पापा ने कहा कि चुने जाने का अर्थ यह नहीं कि हम अनन्य अथवा संप्रदायिक हैं। हम छोटे खमीर की तरह है जो आटा को फुलाता है, हम अपने में नहीं छुपते या पीछे रखते या अपने को दूसरों से अच्छा या शुद्ध समझते हैं। गरूढ़ अपने बच्चों को अपने पंखों में छिपाती, उन्हें पहाड़ की ऊंचाई में ले जाती जब तक वे अपने में उड़ना नहीं सीखते हैं। उसके बाद वह उन्हें अपने सुखद स्थल से बाहर निकले हेतु दबाव डालती है। वह अपने घोंसले को हिलाती और उन्हें बाहर ढ़केलती है जिससे वे अपने पंखों को फैला सकें, वह उनकी सुरक्षा हेतु उनके नीचे उड़ती है जिससे उन्हें चोट न लगे। संत पापा ने कहा कि ईश्वर अपनी चुनी प्रज्ञा के साथ ऐसा ही पेश आते हैं। वे उन्हें विश्वास के साथ साहस में “आगे जाने” की चाह रखते हैं कि केवल वे उनकी रक्षा करेंगे। हमें अपने जीवन में भय का परित्याग करते हुए अपने आराम स्थल से बाहर निकलने की जरूरत है क्योंकि आज बहुत से एस्तोनियाई अपनी पहचान में विश्वास नहीं करते हैं।

अपने आप से बाहर निकलें

संत पापा ने कहा कि पुरोहितों की भांति अपने से बाहर जाये क्योंकि हमने ईश्वर का बपतिस्मा ग्रहण किया है। आप ईश्वर के साथ अपना संबंध स्थापित करें और उनसे मिले जो आप को बुलाते हैं, “मेरा पास आओ।”(मत्ती. 11.28) हमें जितना हो सकें अपने जीवन को दूसरों के लिए देने की आवश्यकता है। यही हमारे लिए “सहचर्य की कला” है। यह “निकटता” में चंगाई प्रदान करने वाले कदमों द्वारा संभव होता है, जहाँ हम आदर और करूणा की दृष्टि को पाते जिसमें चंगाई, स्वतंत्रता और ख्रीस्तीय जीवन में विकास हेतु प्रोत्साहन की शक्ति है। (एंभजेली गैदियुम 169)

पवित्रता सभों के लिए है

हम पवित्र समुदाय की भांति साक्ष्य दें। हम अपने जीवन में इस दुविधा में पड़ सकते हैं कि पवित्रता केवल कुछेक लोगों के लिए है। “हम सभी एक पवित्र जीवन हेतु बुलाये गये हैं, जहाँ हमें अपने जीवन को प्रेम में जीते हुए एक-दूसरे के लिए सभी बातों में साक्ष्य देने हेतु कहा जाता है, चाहे हम कहीं भी हों।”(गौदेते एत एसुलताते 14) लेकिन मरूभूति का पानी किसी व्यक्तिगत नहीं वरन् सभों के उपयोग हेतु था, उसी भांति मन्ना को संग्रहित कर रखा नहीं जा सकता था क्योंकि यह खराब हो जाता था उसी भांति पवित्रता का जीवन प्रसारित होता है, जो हमारे द्वारा फैलता और उन्हें फलहित बनाता जिसका यह स्पर्श करता है। आज हम अपने को उन भाई-बहनों के लिए देते हुए, अपने को संतों के समान बनाते हैं जो समाज में परित्याक्त और हाशिए पर हैं। हम अपने में यह नहीं कह सकते कि ये समस्याएं किसी दूसरे व्यक्ति का या किसी संस्था के कार्य हैं। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने उन भाई-बहनों की ओर नजरें फेरते हुए उनकी ओर अपनी सहायता का हाथ बढ़ायें क्योंकि वे ईश्वर के प्रति रुप में हैं, वे हमारे भाई-बहनें हैं जिन्हें ईश्वर ने बचाया है। संत पापा ने कहा कि हमारे ख्रीस्तीय होने का अर्थ हमारे लिए यही है, अपनी पवित्रता को अपने रोज दिन के जीवन में जीना।

देश का अंग होना हमारा गौरव

एस्तोनियाई निवासी के रुप में आपने अपने इतिहास में आपने अपने सम्मान को दिखलाता है। आप इसे अपने गाना, “मैं एस्तोनियन हूँ, मैं सदा एस्तोनियन रहूँगा, एस्तोनियन होना अपने में अच्छा है,  हम एस्तोनियन हैं।” अपने देश का अंग होना हमारे लिए कितना अच्छ लगता है, अपने में स्वतंत्र और आजाद होना कितना अच्छा है। हम उस पवित्र पर्वत पर जाये, जहाँ मूसा था, जहाँ येसु थे। हम उनसे निवेदन करें जैसा की इस प्रेरितिक यात्रा का आर्दश वाक्य हैं “हृदयों को जागृत करना और पवित्र आत्मा के वरदानों को ग्रहण करना।” संत पापा ने कहा कि इस भांति हम अपने जीवन के हर क्षण में अपना आत्मापरीक्षण करते हुए अपनी स्वतंत्रता में, अच्छी चीजों का चुनाव करते हुए अपने देश और सारे विश्व के लिए ईश्वर की चुनी हुई प्रज्ञा, पवित्र देश, पवित्र पुरोहित वर्ग बन पायेंगे।

25 September 2018, 15:55