बेटा संस्करण

Cerca

Vatican News
Pope Francis' general audience Pope Francis' general audience  (ANSA)

प्रेम, देवमूूर्तियों से निजात

मूर्तिपूजा केवल किसी झूठी चीज की आराधना करना नहीं है। यह हमारे लिए निरंतर विश्वास की परीक्षा है। इसका संबंध उस वस्तु से है जो ईश्वर नहीं है लेकिन हम उसे ईश्वर की संज्ञा देते हैं

वाटिकन सिटी-दिलीप संजय एक्का

वाटिकन सिटी, बुधवार, 01 अगस्त 2018 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने जुलाई महीने के ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद पुनः अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की शुरूआत की। उन्होंने संत पौल षष्टम से सभागार में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को ईश्वर पहली आज्ञा पर अपनी धर्मशिक्षा माला देते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।
हमने ईश्वर के द्वारा मिले दस आज्ञा में आज प्रथम आज्ञा के बारे में सुना। “मेरे सिवाय तुम्हारा कोई ईश्वर नहीं होगा।” (निर्ग.20.3) हमारे लिए यह उचित और महत्वपूर्ण है कि हम मूर्तिपूजा की इस विषयवस्तु पर चिंतन करें।
संत पापा ने कहा कि यह आज्ञा हमें अपने लिए किसी भी तरह की मूर्ति या वस्तुओं की आराधना करने के मना करती है। हमारा मानवीय स्वभाव हमें या तो विश्वासी या अविश्वासी बनता है। उन्होंने कहा कि ख्रीस्तियों के रुप में हम अपने आप से पूछ सकते हैं कि मेरे लिए सच्चा ईश्वर कौन हैॽ क्या मैं तृत्वमय ईश्वर को प्रेम करना हूँ या कलीसिया में मेरी कोई अपनी ही व्यक्तिगत आकृति, मेरी सफलता हैॽ “मूर्तिपूजा केवल किसी झूठी चीज की आराधना करना नहीं है।” यह हमारे लिए निरंतर विश्वास की परीक्षा है। इसका संबंध उस वस्तु से जो ईश्वर नहीं है लेकिन हम उसे ईश्वर की संज्ञा देते हैं।”

हमारे लिए ईश्वर

अस्तित्व के आधार पर ईश्वर क्या हैंॽ वे हमारे जीवन के केन्द्र हैं जिन पर हम बने रहते और जिनके द्वारा हमारा जीवन संचालित होता है। वास्तव में यदि हम अपने को सुसमाचार से तटस्थ कर लेते तो हमारा परिवार नाम मात्र का ख्रीस्तीय परिवार रह जाता है। मानव के रुप में हम अपने को किसी पर केन्द्रित किये बिना जीवित नहीं रह सकते हैं। अतः दुनिया हमारे लिए मूर्तियों की एक “सुपरमर्केट” बनती है जहाँ हम वस्तुओं, चीजों, विचारों और अपने लिए कई प्रतिरुपों को पाते हैं।
आज की हमारी एक देवमूर्ति
संत पापा फ्राँसिन इस बात पर जोर देते हुए कहा कि हमें प्रार्थना करनी चाहिए और हम हे पिता हमारे की प्रार्थना करते हैं। लेकिन मैं एक घटना की याद करता हूँ जब मैं एक दूसरे धर्मप्रान्त की एक पल्ली में यूखारिस्त बलिदान अर्पित करने हेतु गया था जिसके बाद मुझे एक कि.मी. की दूरी पर दृढ़ीकरण संस्कार देने जाना था। मैं पैदल ही उस स्थान को चल पड़ा। मैं एक सुन्दर वाटिका से हो कर गुजर रहा था। वहाँ मैंने देखा कि पचास से अधिक की संख्या में लोग एक दूसरे के आमने-सामने बैठे हुए थे। वहाँ क्या हो रहा थाॽ वे वहाँ भविष्य बतलाने वालों “देवमूर्तियों” की पूजा कर रहे थे। ईश्वर से अपने भविष्य हेतु प्रार्थना करने के बदले वे वहाँ कागजों पर अपने भविष्य को देख रहे थे।
संत पापा ने कहा कि यह हमारे समय की मूर्तिपूजा है। आप में से कितने हैं जो कागजों पर अपना भविष्य देखने हेतु गये हैंॽ हम से कितने हैं जो प्रार्थना करने के बदले अपने हाथों को दिखलाते हुए अपने भविष्य का पता लगाते हैंॽ ईश्वर जीवित हैं जो हमारी सहायता करते हैं जबकि अन्य देवमूर्तियाँ किसी भी रुप में हमारी मदद नहीं करती हैं।

मूर्तिपूजा का विकास

हमारे जीवन में मूर्तिपूजा का विकास कैसे होता हैॽ संहिता की आज्ञा हमें कहती है, “अपने लिए कोई देवमूर्ति मत बनाओ...,उन मूर्तियों को दण्डवत कर उनकी पूजा मत करो।” (निर्ग,20.4-5)
ईब्रानी भाषा में “मूर्ति” शब्द क्रिया “देखना” से आती है। मूर्ति एक दृश्य है, एक तरह की लत जहाँ हमारी आंखें टिकी होती हैं। मूर्ति के रुप में हम वास्तव में अपने आप को किसी वस्तु या किसी परियोजना स्वरुप प्रस्तुत करते हैं। संत पापा ने कहा कि विज्ञापन इस आयाम का उपयोग करता है, जहाँ हम वस्तु को नहीं देखते वरन उस वस्तु जैसे कि कार, स्मार्ट-फोन या किसी अन्य चीजों के रुप में अपने आप को देखते हैं, जो हमारी चाह और जरूरत बन जाती है। इस तरह मैं उसकी खोज करता हूँ, उसके बारे में सोचता हूँ और उस वस्तु को अपना बनाने या उस परियोजना को पूरा करना चाहता हूँ, उस मुकाम तक पहुँचने की इच्छा रखता हूं जो मुझे अत्यधिक खुशी प्रदान करती है। इस तरह मेरे जीवन की सारी चीजें उस वस्तु की ओर केन्द्रित हो जाती है।

हमारी मूर्तिपूजा का स्वरूप

संत पापा ने कहा कि पहली आज्ञा का दूसरा पद हमें कहता है,“उन मूर्तियों को दण्डवत मत करो।” मूर्तियाँ हमसे पूजा अर्चना की मांग करती हैं। हम उनके सामने नतमस्तक होते और उन्हें सभी तरह के बलिदान चढ़ाते हैं। प्राचीनकाल में देवमूर्तियों को मावन बलि चढ़ाई जाती थीं जो आज भी होता है। हम अपने जीवन में सफलता हासिल करने हेतु अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने बच्चों की बलि चढ़ाते हैं, उनका परित्याग करते, उन्हें अपने जीवन में लाना नहीं चाहते, अपनी सुन्दरता कायम रखने हेतु हम मानव का बलिदान चढ़ाते हैं। हम कितना समय दर्पण के सामने बीते हैंॽ कुछ लोग, कुछ नारियाँ रुप-सज्जा, श्रृंगार करने में अपना समय व्यतीत करती हैं...और यह भी एक तरह की मूर्तिपूजा है। संत पापा ने कहा कि श्रृंगार करना अपने में खराब नहीं है। लेकिन इसके द्वारा हम अपने को देवी न बनायें। सुन्दरता मानव जीवन का बलिदान करती है। प्रसिद्धि स्वयं को जलाने, हमारी वास्तविकता और निष्कपटता का विनाश करती है। देवमूर्तियाँ खून की मांग करती हैं। पैसा हमसे जीवन की खुशी छीन लेती और हमें अकेलेपन की ओर ले चलती है। अर्थव्यवस्था का स्वरुप लाभ हेतु मानव जीवन की बलि चढ़ाता है। हम उन लोगों के बारे में सोच सकते हैं जो बेरोजगार हैं, क्योंॽ क्योंकि कम्पनियों ने व्यापक लाभ के खातिर लोगों को कार्यों से निकाल दिया है। पैसा देवमूर्ति के समान है। आज हम दिखावे की जिन्दगी जीते हैं। हम दूसरे को खुश करने की कोशिश करते हैं क्योंकि हम अपनी ही बातों से प्रभावित हैं। आज हम जीवन का विनाश होता, परिवारों को टूटता और युवाओं को अपने में विनाश की स्थिति में पड़ा हुआ पाते हैं क्योंकि हम लाभ कमाने की योजना से प्रभावित हैं। संत पापा ने कहा कि ड्रग्स भी हमारे लिए मूर्ति है। आज कितने ही युवा हैं जो अपने स्वास्थ्य को, अपने जीवन को इस मूर्ति की पूजा करने में बिगाड़ रहें हैं।
यहाँ हम पहली आज्ञा की तीसरे सबसे अहम विन्दु को पाते हैं... “तुम उनकी पूजा मत करो।” मूर्तिपूजा हमें गुलाम बनाती है। वे हमें खुशी प्रदान करने की प्रतिज्ञा करती लेकिन ऐसा नहीं होता है। हम उन चीजों को प्राप्त करने में लगे रहते हैं और अपना विनाश करते हैं, हम आशा में लगे रहते लेकिन हमारी आशाएं कभी पूरी नहीं होती हैं।

ईश्वर और देवमूर्तियों में अन्तर

संत पापा ने कहा प्रिय भाइयो और बहनों देवमूर्तियां हमें जीवन देने के समान दिखलाई देती हैं लेकिन वास्तव में वे हमारे जीवन को छीन लेती हैं। सच्चे ईश्वर हमसे जीवन की मांग नहीं करते लेकिन वे हमें जीवन का उपहार प्रदान करते हैं। वे हमें सफलता का स्वप्न नहीं दिखलाते बल्कि प्रेम करना सिखलाते हैं। वे हमसे हमारी संतानों की माँग नहीं करते वरन हमें अपने पुत्र को देते हैं। देवमूर्तियाँ हमें भविष्य हेतु संभावनाएं दिखलाती हैं और हमें अपने वर्तमान से विमुख करती हैं। सच्चा ईश्वर हमें अपने प्रतिदिन के जीवन की सच्चाई को जीना सिखलाते हैं, आज, कल और आने वाला कल जिसके द्वारा हम भविष्य में विकास करते हैं।

देवमूर्तियों से निजात

संत पापा ने सबों का आहृवान करते हुए कहा कि हमारे जीवन में कितनी सारी देवमूर्तियाँ हैं, कौन-सी देवमूर्ति हमारे पंसद की हैॽ क्योंकि जब हम अपने जीवन की देवमूर्तियों को पहचानते हैं तो यह हमारे लिए कृपा की शुरूआत होती है और हम प्रेम के मार्ग में बढ़ते हैं। वास्तव में प्रेम और मूर्तिपूजा आपस में परस्पर-विरोधी हैं यदि कोई चीज हमारे जीवन के लिए पूर्ण और अद्वितीय बन जाती तो यह पति-पत्नी, बच्चा या मित्रता से अति महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी वस्तु या विचार धारा के प्रति हमारी आसक्ति हमें प्रेम में अंधभक्त बना देती है। इस प्रकार उस वस्तु के पीछे भागने के कारण हम अपने माता-पिता, बच्चे, पत्नी और परिवार... का भी परित्याग कर देते हैं जो हमारे लिए अति प्रिय हैं। किसी चीज के प्रति हमारी आसक्ति हमें अंधा बना देती है। हमें इसे अपने हृदय में लाने की जरूरत है, देवमूर्तियां हमारे प्रेम का हरण करतीं, वे हमें अंधा बना देती हैं। हमें सच्चा प्रेम करने हेतु सभी देवमूर्तियों से स्वतंत्र होने की जरूरत है। संत पापा ने कहा, “मेरे लिए देवमूर्ति क्या हैॽ मुझे इस अपने जीवन से बाहर फेंकना है।
इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने विभिन्न देशों से आये तीर्थयात्रियों और विश्वास का अभिवादन किया और अन्त में उनके साथ हे पिता हमारे का पाठ करते हुए सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।
 

01 July 2018, 16:15