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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस 

सुन्दरता के बिना सुसमाचार को नहीं समझ सकते, संत पापा

वाटिकन के संत मर्था प्रार्थनालय में बृहस्पतिवार को ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए संत पापा फ्राँसिस ने कलाकारों के लिए प्रार्थना की तथा सभी ख्रीस्तियों को याद दिलाया कि वे ईश्वर की चुनी हुई प्रजा के हिस्से हैं।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 7 मई 2020 (रेई)- पास्का के चौथे सप्ताह के बृहस्पतिवार को ख्रीस्तयाग आरम्भ करते हुए संत पापा ने उन कलाकारों की याद की जिन्होंने उन्हें धन्यवाद देते हुए पत्र लिखा है। संत पापा ने कहा, "मैं प्रभु से याचना करता हूँ कि वे उन्हें आशीष प्रदान करें क्योंकि कलाकारों के माध्यम से हम सुन्दरता को समझते और बिना सुन्दरता के हम सुसमाचार को नहीं समझ सकते।"

बुधवार को लाईव प्रसारण के माध्यम से धर्मशिक्षा देने के उपरांत संत पापा ने कहा था, "कलाकार ही हैं जो इस मौन कराह को व्यक्त करते हैं जो हर सृष्ट जीव को दबाती है और सबसे बढ़कर यह पुरूषों एवं स्त्रियों के हृदय से निकलती है क्योंकि मनुष्य ईश्वर के सामने एक भिखारी है।"

ईश प्रजा का इतिहास

अपने उपदेश में संत पापा फ्राँसिस ने प्रेरित चरित से लिए गये पाठ पर चिंतन किया (प्रे.च 13,13-25) जिसमें पौलुस पिसीदिया के अंतियोखिया पहुँचते हैं, वहाँ के सभागृह जाते और इस्राएली लोगों का इतिहास बतलाते हैं और येसु की घोषणा हमारे मुक्तिदाता के रूप में करते हैं।

संत पापा ने कहा, "जब पौलुस नई धर्मशिक्षा के बारे बतलाते हैं तब वे मुक्ति के इतिहास के बारे बोलते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि येसु की ओर बढ़ने में एक अनुग्रह का, चुने जाने का और व्यस्थान का इतिहास है।"

ईश्वर और उनकी प्रजा के लम्बे इतिहास पर प्रकाश डालते हुए संत पापा ने कहा, "प्रभु ने अब्राहम को चुना और अपने लोगों के साथ यात्रा की।" पौलुस इतिहास की शुरूआत येसु से नहीं करते क्योंकि ख्रीस्तीयता मात्र धर्मसिद्धांत नहीं है बल्कि एक इतिहास भी है जो अपने धर्मसिद्धांत को आगे ले चलता है।  

ख्रीस्तीयता नैतिक सिद्धांतों से बढ़कर है

संत पापा ने कहा कि ख्रीस्तीयता सिर्फ नैतिक और सदाचारी सिद्धांतों से नहीं बना है और न ही व्यक्ति अपने नैतिक दृण्टिकोणों के कारण ख्रीस्तीय है। ख्रीस्तीयता इससे बढ़कर है।

संत पापा ने कहा कि "ख्रीस्तीय, समाज के उत्कृष्ट लोग भी नहीं हैं। ख्रीस्तीय होने का अर्थ है उस समुदाय का सदस्य होना जो ईश्वर द्वारा स्वतंत्र रूप से चुना गया है।" यदि हममें ये चेतना नहीं है, एक समुदाय का हिस्सा होने का ज्ञान नहीं है तब हम विचारधारा के ख्रीस्तीय मात्र रह जायेंगे, सच्चे ख्रीस्तीय नहीं।  

ईश्वर की प्रजा होने की चेतना को कभी न खोयें

संत पापा ने खेद प्रकट किया कि कई बार हम भेदभाव की भावना में गिर जाते हैं। उन्होंने समाज में उत्कृष्ट होने के दृष्टिकोण की निंदा की और कहा कि यह ख्रीस्तियों के लिए अत्यन्त पीड़ादायक है जो उन्हें ईश्वर की प्रजा होने की चेतना को खोने की ओर आगे ले जाता है।

संत पापा ने विश्वासियों को निमंत्रण दिया कि वे ईश्वर की प्रजा होने के प्रति हमेशा सचेत रहें, मुक्ति के इतिहास को हस्तांतरित करें और यादों को बनायें रखें।

उन्होंने कहा, "इब्रानियों के पत्र का लेखक कहता है, अपने पूर्वजों की याद करें।" उन्होंने कहा कि ख्रीस्तियों के विचलित होने का सबसे मूल कारण है यादों की कमी कि वे एक प्रजा हैं। उन्होंने गौर किया कि यही वह विन्दु है जहाँ धर्मसिद्धांतवाद, नैतिकवाद एवं उत्कृटतावाद का उदय होता है।

ईश्वर की प्रजा एक प्रतिज्ञा, एक व्यवस्थान के अनुसार चलती है जिसको स्वयं उन्होंने नहीं बनाया बल्कि वह जानती है कि वह ईश्वर की विश्वासी, पवित्र प्रजा है जो पूरी तरह विश्वस्त और अपने विश्वास में अचूक है।

संत पापा का ख्रीस्तयाग 7 मई 2020
07 May 2020, 10:01
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