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संत मर्था में ख्रीस्तयाग संत मर्था में ख्रीस्तयाग  (Vatican Media)

अधिकार का अर्थ आदेश देना नहीं बल्कि सुसंगति एवं साक्ष्य

संत पापा फ्राँसिस ने "बेतुके" ख्रीस्तियों एवं रूढ़ीवादी पुरोहितों द्वारा किये गये हानि पर प्रकाश डाला जो साक्ष्य नहीं देता बल्कि प्रभु के रास्ते, उनके सच्चे अधिकार से अपने आपको दूर कर लेते हैं।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 14 जनवरी 2020 (रेई)˸  संत पापा ने ये बातें मंगलवार को वाटिकन के प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए कही।   

प्रवचन में उन्होंने संत मारकुस रचित सुसमाचार से लिए गये पाठ पर चिंतन किया जहाँ येसु अधिकार से साथ शिक्षा देते हैं। येसु जब सभागृह में शिक्षा दे रहे थे तब लोगों ने उनके शिक्षा देने के तरीके को फरीसियों के समान नहीं किन्तु अधिकार के साथ शिक्षा देना कहा।

संत पापा ने येसु के "अधिकार रखने" या "आंतरिक अधिकार होने" तथा सदूकियों के अधिकार के बीच अंतर की व्याख्या की। संहिता की शिक्षा देने में माहिर होने और लोगों के द्वारा सुने जाने बावजूद वे विश्वसनीय नहीं थे।

येसु का अधिकार

संत पापा ने कहा कि प्रभु का अधिकार "स्वामित्व" है जिसके द्वारा वे शिक्षा देते, चंगा करते और लोगों को सुनते थे। यह स्वामित्व अंदर से आता था जो उनकी शिक्षा एवं कार्यों के बीच सामंजस्य में प्रकट होता था। अतः अधिकार सुसंगति एवं साक्ष्य द्वारा प्रकट होता है।

ढोंगी और रूढ़ीवादी पुरोहित

संत पापा ने कहा कि इसके विपरीत सदूकी सम्बद्ध नहीं थे यही कारण है कि येसु लोगों को चेतावनी देते हैं कि वे जो कहते हैं उसे करते रहो किन्तु उनका अनुकरण मत करो। येसु सदूकियों को फटकारने के अवसर से नहीं चूकते थे क्योंकि इसी मनोभाव के द्वारा वे रूढ़ीवादिता के गर्त में गिर चुके थे जो कहते कुछ थे और करते कुछ और थे। सुसमाचार में येसु उन्हें कभी-कभी उन्हें दरकिनार करते थे अथवा कोई उत्तर नहीं देते थे।  

संत पापा ने कहा कि येसु ने असुसंगति एवं रूढ़िवादिता को बतलाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया है वह है, "ढोंगी"। संत मति रचित सुसमाचार के अध्याय 23 में येसु ने सदूकियों एवं फरीसियों को कई बार ढोंगी कहा है। संत पापा ने कहा कि ढोंग उन लोगों का दिखावा है जिन्हें कर्तव्य सौंपा गया है। अतः जिन्हें प्रेरितिक जिम्मेदारी मिली है किन्तु वे उसके अनुकूल कार्य नहीं करते। वे स्वामी नहीं हैं इसलिए अधिकार भी नहीं है। ईश प्रजा विनम्र और सहनशील होती है।   

असंबद्ध ख्रीस्तीय होना एक कलंक है

संत पापा ने कहा कि ईश्वर की प्रजा जो सहनशील है वह कृपा के सामर्थ्य को पहचानती है। इसे सामुएल के ग्रंथ से लिए गये पाठ में दिखाया गया है जहाँ याजक एली ने अपना सारा अधिकार खो दिया था, उसमें केवल अभिषेक की कृपा रह गयी थी। उसी कृपा से उसने अन्ना को आशीर्वाद दिया और चमत्कार भी हुआ। अन्ना जो अत्यधिक दु˸ख से व्याकुल थी और माँ बनने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी। इस घटना पर चिंतन करते हुए संत पापा ने कहा कि ईश्वर की प्रजा व्यक्ति के अधिकार एवं अभिषेक की कृपा के बीच अंतर समझ सकता है। यह लोगों की विवेकशीलता है जो कई असुसंगत पुरोहितों को सदूकियों के समान सहन कर सकते हैं जो हर रविवार को गिरजा जाते किन्तु गैरख्रीस्तीयों की तरह जीते हैं। लोग एक अपमानजनक एवं प्रतिकूल व्यवहार को तुरन्त भाप लेते हैं। असुसंगत ख्रीस्तीय साक्ष्य नहीं देते, वे असंबद्ध एवं रूढ़ीवादी होते हैं। संत पापा ने कहा कि वे केवल हानि पहुँचाते हैं।     

  संत पापा ने प्रार्थना की कि हर बपतिस्मा प्राप्त विश्वासी अपने अधिकार को पहचान सकें जो आदेश देने एवं उसका पालन कराने में नहीं है बल्कि सुसंगत होने, साक्ष्य देने और प्रभु के रास्ते पर उनके सहयोगी होने में है।

 

14 January 2020, 17:25
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