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संत मार्था में संत पापा का ख्रीस्तयाग संत मार्था में संत पापा का ख्रीस्तयाग  (© Vatican Media)

बुजुर्ग और युवा हमारी आशा की निशानी, संत पापा

वाटिकन के अपने निवास संत मार्था के प्रार्थनालय में संत पापा ने प्रातकालीन मिस्सा के दौरान ईश्वर को प्रेम सदा अर्थपूर्ण बतलाते हुआ कहा कि युवाओं और बुजुर्गो की देख-रेख करना हमारी संस्कृति को बचा कर रखती है।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 30 सितम्बर 2019 (रेई) ईश्वर का अपनी संतान हेतु प्रेम “बेकार” को नहीं जाता। यह उस आग के समान है जो हमें और अधिक मानवीय बनाता है। समाज और परिवार में, अनउपयोगी बच्चों और बुजुर्गों का परित्याग करना ईश्वरीय उपस्थिति की निशानी नहीं है। उक्त बातें संत पापा फ्रांसिस ने संत मार्था के प्रार्थनालय में अपने प्रातकालीन मिस्सा बलिदान के दौरान नबी जकर्या के ग्रंथ से लिए गये पाठ पर चिंतन करते हुई कहीं।

उन्होंने कहा कि ईश्वर का प्रेम अपने लोगों के लिए कितना महान हैं यद्यपि वे उन्हें भूल जाते, घोखा देते और अविश्वासी बन जाते हैं। ईश्वर में वह अग्नि है जो सदैव बनी रहती है जहाँ से हमारे लिए मुक्ति प्रवाहित होती है। जकर्या के ग्रंथ का अध्याय 8 पद 1 कहता है, “विश्वमंडल का प्रभु यह कहता है, मैं सियोन की बहुत अधिक चिंता करता हूँ, मुझे में उसके प्रति उत्साह है। मैं सियोन लौट रहा हूँ, मैं येरुसलेम में निवास करने आ रहा हूँ।” हम ईश्वर का धन्यवाद करते हैं क्योंकि वह येरुसलेम को जीवन देने आते हैं।

बुजुर्गों और बच्चों की चिंता, भविष्य की प्रतिज्ञा

संत पापा ने कहा कि पहले पाठ में ईश्वर की “उपस्थिति की निशानी” हमारे लिए स्पष्ट है। उनकी उपस्थिति हमें अपने जीवन में “अधिक मानवीय” बनाती है, यह हमें “प्रौढ़” बनाती है। यह हमारे जीवन में ईश्वर के अतुल्य कृपा को व्यक्त करती है। यह मानव समाज, परिवारों और चौराहों को समृद्धि से भर देती है।

जीवन की निशानी, जीवन का सम्मान, जीवन में प्रेम, जीवन का विकास है यह हमारा ध्यान इस ओर कराता है कि ईश्वर हमारे समुदायों में निवास करते हैं, बुजुर्गो की उपस्थिति हमारे जीवन को प्रौढ़ता प्रदान करती है। यह अपने में कितना रमणीय लगता है, “वृद्ध पुरूष और स्त्रियाँ अपने बुढ़ापे के कारण हाथ में छड़ी लेकर येरुसलेम के चौराहों में बैठेंगे।” नगर के चौक खेलते बच्चों से भरे रहेंगे। बच्चों और बुगुर्जों की उपस्थिति हमारे जीवन में वह निशानी है जो हमारे जीवन में एक-दूसरे के प्रति सेवामय चिंता के भाव को व्यक्त करती है। ये हमारे बीच ईश्वर के निवास को व्यक्त करता है जो हमारे लिए भविष्य की प्रतिज्ञा और निधि हैं।

फेंकने की संस्कृति विनाशा का कारण

संत पापा ने नबी योवेल के ग्रंथ को उद्धृत करते हुए कहा, “तुम्हारे नवयुवकों को दिव्य दर्शन होंगे और तुम्हारे बुजुर्ग सपने देखेंगे।” हम यहाँ दोनों के बीच आदान-प्रदान की स्थिति को पाते हैं जो तब तक नहीं होता जब तक हम अपने में फेंकने की संस्कृति से प्रभावित होते हैं, जब हम बुजुर्गों को उनकी अनउपयोगिता के कारण वृद्धा आश्रम में छोड़ आते हैं। संत पापा ने बुजुर्गो और बच्चों के परित्याग पर जोर देते हुए एक नानी की छोटी यादगारी को साझा किया। एक परिवार में पिता अपनी दादी माँ को खाने के लिए अलग करना चाहते थे क्योंकि वह बुढ़ी हो गई थी और खाने के क्रम में भोज उसके हाथों के गिर जाया करता और वह गंदी हो जाती थी। एक दिन घर लौटने पर उनसे अपने बेटे को लकड़ी का तख्ता तैयार करते हुए देखा क्योंकि वह भी अपने में एक दिन उसी अवस्था को प्राप्त करेगा। जब हम “बच्चों और बुजुर्गों को एक दूसरे से अलग करते हैं” तो हम वर्तमान समाज को प्रभावित करते हैं।

जब एक शहर पुराना हो जाते और अब बच्चे नहीं रहते तो आप गलियों में बच्चों के व्लीचेर को नहीं देखते हैं। अब गर्भवती महिलाओं को नहीं देखते हैं। “बच्चे, बेहतर है नहीं...”। जब आप इस बात से वाकिफ होते कि देश में सेवानिवृत होने वाली की संख्या कार्य करने वालों की संख्या से अधिक है तो यह दुःखदायी होता है। आज कितने देश हैं जो इस जनसांख्यिकीय सर्दी का अनुभव करने लगे हैं। जब हम अपने बुजुर्गो का परित्याग करते हैं तो हम अपनी परंपरा को खो देते हैं। परंपरा अपने में संग्रहालय नहीं वरन भविष्य की सुनिश्चितता है। यह जड़ों में वह रस है जो पेड़ को बढ़ने, फूलने और फलहित होने में मदद करता है। ऐसा करना हमारे समाज को दोनों रुपों में सूखा बना देता है।

संत पापा ने कहा कि यह सच है “हम अपने में जवान बने रह सकते हैं।” आज कितनी ही कम्पनियाँ हैं जो टिकट, पलास्टिक सर्जरी और चेहरा का रुप-रंग बेच रहीं हैं। लेकिन इन सारी चीजों का विनाश हो जाता हैं।

युवा और बुजुर्गः कलीसिया और घर की आशा

संत पापा ने कहा कि ईश्वर के संदेश का केन्द्र-विन्दु क्या हैॽ यह “आशा की संस्कृति” है जो हमारे लिए “बुजुर्ग और युवा” हैं। वे हमारे देश, शहर और कलीसिया के जीवन की निश्चितता हैं। माता-पिता जो अपने बच्चों की परवरिश करते हैं मानों वे उन्हें अपने अभूषणों स्वरुप दिखा रहे हों तो वे इस बात को याद करें- उन्होंने कहा कि मैं रोमानिया की एक बुजुर्ग महिला को कभी नहीं भूलाता हूँ जो अपनी बाहों में अपने भतीजे को गोदी की हुई थी। उन्होंने मुझे उसे इस भांति दिखाया मानो “वह उसका विजयी उपहार” है। ईश्वर के प्रेम को हम सदा प्रसारित करते और उसके द्वारा लोगों के जीवन को विकसित करने हेतु बुलाये जाते हैं। हम अपनी संस्कृति को विनाश न करें।

संत पापा ने अंत में पुरोहितों से अनुरोध करते हुए कहा कि रात को जब आप अपने अंतःकारण की जाँच करते हैं तो यह पूछें कि मैंने बच्चों और बुजुर्गों से किस तरह का व्यवहार किया हैॽ यह हमारी सहायता करेगा।

30 September 2019, 16:18
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