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 संत मार्था में ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा संत मार्था में ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा  (ANSA)

प्रतिस्पर्धा और स्वयं की महिमा, युद्ध का कारण

संत मार्था के प्रार्थनालय में संत पापा ने “व्यक्तिगत चुनाव” और “स्वरूचि” के बदले कृतज्ञता में जीवन को विश्व के लिए जीने का संदेश दिया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा फ्रांसिस ने वाटिकन के प्रार्थनालय संत मार्था में अपने प्रातःकालीन मिस्सा बलिदान के दौरान संत लूकस रचित सुसमाचार पर चिंतन करते हुए कहा कि “प्रतिस्पर्धा और स्वयं की महिमा” समुदाय की आधारशिला का विनाश करती और विभाजन तथा हमारे मध्य संघर्ष उत्पन्न करती है।

कृतज्ञता वैश्विक न की ऐच्छिक चुनाव

येसु की शिक्षा हमारे लिए स्पष्ट है, “अपनी इच्छा के अनुसार चीजों का चुनाव न करें”, आप अपनी सुविधा के अनुरूप अपनी मित्रता का चुनाव न करें। अपनी “व्यक्तिगत-रुचि” के अनुसार कार्य करना वास्तव में “एक स्वार्थ, अलगाव और व्यक्तिगत इच्छा” के भाव को निरुपित करता है। येसु के संदेश ठीक इसके विपरीत हैं,“हमारी कृतज्ञता” जीवन को “विस्तृत” करती है। यह हमारे “जीवन की क्षीतिज का विस्तार करती” क्योंकि इसके द्वारा हम विश्व के लिए अपने को प्रस्तुत करते हैं। अपनी रुचि के अनुरुप चुनाव “विभाजन का कारण” बनती है और यह हमारी सर्वसहमति में सहायक नहीं होती है जिसके बारे में संत पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया से कहते हैं। सतं पापा ने कहा, “प्रतिस्पर्धा औऱ स्वयं की महिमा” ये दो बातें हैं जो हमारी एकता को तोड़ देती है।

संत पापा ने कहा कि बकवास का जन्म प्रतिस्पर्धा से होता है, क्योंकि बहुत से लोग हैं जो अपने में यह अनुभव करते कि वे अपने में विकास नहीं कर सकते हैं। अतः दूसरों से आगे निकलने हेतु या अपने को बड़ा सिद्ध करने के लिए वे दूसरे की चुगली करते हैं। यह दूसरों का विनाश करना है। यह प्रतिस्पर्धा है। संत पापा ने कहा कि संत पौलुस कहते हैं, “नहीं, आप के समुदाय में ऐसा न हो।” प्रतिस्पर्धा अपने में एक संघर्ष है जहाँ हम दूसरे को दबाते हैं। यह अपने में खराब है। अपने में प्रतिस्पर्धा की भावना को हम खुले रूप में, सीधे तौर पर नहीं दिखाते वरन इसके द्वारा हम सदैव दूसरों को नीचा दिखलाते औऱ अपने को ऊपर स्थापित करने की कोशिश करते हैं। मैं अपने में उतना अच्छा नहीं हो सकता अतः मैं दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करता हूँ जिससे मैं सदा ऊंचा बना रहूँ। यह प्रतिस्पर्धा हमारे स्वार्थ को दिखलाती है।

स्वयं को दिखलाना सामुदायिकता का नाश करना

अपने को बड़ा दिखाना समुदाय की एकता, परिवार की स्थिति को बिगाड़ देती है। संत पापा ने कहा कि इस संदर्भ में हम पिता के अधिकारों को प्राप्त करने हेतु भाइयों के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना को देख सकते हैं, यह हमारे प्रतिदिन के जीवन में होता है। “हम इस पर विचार करें, हम जो अपने को दूसरे से उत्त्म होने का घंमड करते हैं।”  

ख्रीस्तीयता का जन्म येसु के प्रति कृतज्ञता में

संत पापा ने कहा कि एक ख्रीस्तीय के रुप में हमें ईश्वर के पुत्र येसु ख्रीस्त के उदाहरण का अनुसारण करते हुए अपने में “कृतज्ञता” के भाव को उत्पन्न करना चाहिए। हम अपने जीवन में दूसरों की चिंता किये बिना दूसरों की भलाई करनी चाहिए यद्यपि दूसरे इसे कर रहे होते हैं। हमें अपने में “प्रतिस्पर्धा या स्वयं की महिमा” के भाव का परित्याग करना है। अपने छोटे कार्यों के द्वारा शांति स्थापित करने का अर्थ है विश्व के लिए शांति का मार्ग तैयार करना है।  

संत पापा ने कहा कि जब हम युद्धों के बारे में पढ़ते तो हम भूखे बच्चों की याद करें जो यमन में हैं, युद्धग्रस्त परिस्थिति में जीवन यापन कर रहें हैं। उन बेचारे बच्चों के पास खाने को कुछ नहीं हैं। लेकिन वही युद्ध घर में, हमारे संस्थानों, पल्लियों, कार्यस्थलों शुरू हो जाती है तो ऐसी स्थिति में हमें अपने स्वार्थ का परित्याग कर सर्वसहमति और शांति स्थापित करने का प्रयास करने की जरुरत है।

05 November 2018, 15:24
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