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संत मार्था में ख्रीस्तयाग संत मार्था में ख्रीस्तयाग  (Vatican Media)

संत पापाः धर्माध्यक्ष राजकुमार नहीं वरन् सेवक

संत पापा फ्रांसिस ने वाटिकन के संत मार्था के प्रार्थनालय में अपने प्रातःकालीन मिस्सा बलिदान के दौरान प्रवचन में धर्माध्यक्षों के कार्यों पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा ने कलीसिया द्वारा संत जोसेफात धर्माध्यक्ष शहीद की यादगारी मनाते हुए संत पौलुस द्वारा तीतुस को लिखे गये पत्र पर अपना चिंतन प्रस्तुत किया। उन्हें कलीसिया के संबंध में धर्माध्यक्षों के उत्तरदायित्व का विस्तार से जिक्र करते हुए उन्हें नम्र और दीन होने, न कि राजकुमारों-सा बर्ताव करने की बात कही।

कलीसिया का जन्म पूर्ण संतुलन में नहीं हुआ

संत पापा ने कलीसिया की उत्पति के संदर्भ में कार्य औऱ असंतुलन दो शब्दों का जिक्र करते हुए कुछ “प्रशंसनीय बातों” की भी याद की। उन्होंने कहा,“हम कलीसिया में सदैव उलझन की स्थिति को पाते हैं, हम पवित्र आत्मा की शक्ति के अलावे असंतुलन को पाते लेकिन हमें इन बातों से भयभीत नहीं होना है, क्योंकि यह अपने में एक सुन्दर चीज है।” संत पापा ने कहा कि कलीसिया का जन्म कभी भी पूर्ण व्यवस्थता में नहीं हुआ है। हम इसे कठिनाइयों, उलझनों से मुक्त नहीं पाते हैं। इसका जन्म इसी तरह हुआ है। इस अव्यवस्थित, उलझन को हमें व्यवस्थित करने की जरुरत है। यह सच है उदाहरण के लिए हम येरुसलेम के प्रथम महासभा को ले सकते हैं जहाँ हम यहूदियों और गैर-यहूदियों के बीच तकरार की स्थिति को पाते हैं। हम महासभा के द्वारा मुसीबतों का हल निकालते हैं।

धर्माध्यक्ष ईश्वर के संचालक

संत पापा इस बात पर जोर देते हुए कहा कि संत पौलुस तीतुस को केरेत में छोड़ते हुए “विश्वास के बारे में कहते हैं।” वे उन्हें धर्माध्यक्षों के कार्य औऱ अधिकार के बारे में निर्देश देते हैं कि “वह कैसे ईश्वर का संचालक बनें।”

उन्होंने कहा कि धर्माध्यक्ष की परिभाषा को हम “ईश्वर के संचालक के रुप में पाते हैं, न की संपति और शक्ति के संचालक स्वरुप।” उसे सदैव अपने में यह पूछने की आवश्यकता है, “क्या मैं ईश्वर का सेवक हूँ या एक व्यापारीॽ” यह ईश्वर के द्वारा अब्रहाम को कहे गये उस बात की याद दिलाती है,“तुम मेरी उपस्थिति में चलो और सदैव सदाचारी बने रहो।” यह नेता के लिए एक मुख्य बात है।

धर्माध्यक्ष की छवि

संत पापा ने धर्माध्यक्ष को कैसा नहीं होना चाहिए पर बल देते हुए कहा कि एक वह अपने में अहंकारी या घमंडी, क्रोधी और मतवाला न हो जो संत पौलुस के समय में सामान्य बुराई थी। वह व्यपारी न हो या धन के प्रति असक्त न हो। उन्होंने कहा कि यदि किसी धर्माध्यक्ष में इन बुराइयों में कोई एक व्याप्त हो तो यह कलीसिया के लिए विप्पति बन जाती है। इन सारी चीजों के विपरीत एक धर्माध्यक्ष लोगों का स्वागत करे, अच्छाई से प्रेम करे, संवेदनशील बने, अपने में आत्मसंयमी और पवित्र रहे, वह ईश्वर वचनों के प्रति निष्ठावान हो जिसे उसे सिखाया गया है। संत पापा ने कहा कि ईश्वर के सेवक की ये सारी विशेषताएं हैं।

एक धर्माध्यक्ष की छवि ऐसी होनी है। जब हम किसी धर्माध्यक्ष का चुनाव हेतु उम्मीदवार की खोज कर रहें होते तो क्या यह अच्छा नहीं कि हम इन सारे सवालों को सामने रखें। हम अपने में और कई सवालों के साथ एक सर्वे कर सकते हैं लेकिन उनमें सबसे अहम यह है कि धर्माध्यक्ष को अपने में नम्र, दीन औऱ सेवक होना चाहिए न की राजकुमार। “ओह, हाँ, हम इन बातों से वाकिफ हैं द्वितीय वाटिकन महासभा हमें इनसे रुबरु कराती है, नहीं, ये बातें संत पौलुस के समय से ही चली आ रही हैं।” यह कलीसिया की शुरूआती दिनों से ही प्रचालित है जहाँ हम धर्माध्यक्षों के पद को पाते हैं।

संत पापा ने अपने उपदेश के अंत में कहा कि कोई धर्माध्यक्ष कलीसिया को तबतक सुव्यवस्थित नहीं कर सकता जब तक वह इन गुणों को धारण न करें। ईश्वर के सामने हमारे लिए अच्छा होना, अच्छा उपदेश देना अर्थपूर्ण नहीं होता यदि हम अपनी नम्रता में बने रहते हुए सेवा नहीं करते हैं। संत जोसेफात धर्माध्यक्ष और शहीद की याद करते हुए संत पापा ने धर्माध्यक्षों हेतु प्रार्थना किया कि वे संत पौल के निर्देशानुसार खरा उतर सकें।

12 November 2018, 16:18
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