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 दिल्ली में भारतीय दलित ख्रीस्तियों और मुस्लिम दलितों का  भेदभाव के विरोध  में प्रदर्शन दिल्ली में भारतीय दलित ख्रीस्तियों और मुस्लिम दलितों का भेदभाव के विरोध में प्रदर्शन 

"काला दिवस" भारतीय दलित ईसाइयों के भेदभाव के खिलाफ विरोध

भारतीय संविधान हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों के उत्थान के लिए सामाजिक लाभ और विशेषाधिकार प्रदान करता है, लेकिन मुस्लिम और ईसाई दलितों के सामाजिक लाभ और विशेषाधिकार को इनकार करता है। भारतीय ईसाइयों द्वारा 10 अगस्त का "काला दिवस" का विरोध इस भेदभाव के खिलाफ है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

भारत, मंगलवार 11 अगस्त,2020 (वाटिकन न्यूज) : भारत के ईसाईयों ने सोमवार को "काला दिवस" मनाया और लोगों को याद दिलाया कि ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को संविधान आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।

"दलित"  शब्द जो संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है "टूटा हुआ" या "गिरा हुआ","अछूत" को इंगित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। उन्हें हिंदू समाज की जाति व्यवस्था के बाहर माना जाता है परिणामस्वरूप, सदियों से, दलितों को अत्यधिक शोषण, अमानवीय व्यवहार, अत्याचार और गरीबी का सामना करना पड़ा है।

उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान में मदद करने के लिए, भारतीय संविधान उनके लिए विशेषाधिकार और लाभ जैसे सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में कोटा रखता है।

भेदभाव

संविधान जिसपर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 10 अगस्त 1950 को हस्ताक्षर किया था, उसके आदेश अनुसार अनुसूचित जनजाति के तीसरे अनुच्छेद में कहा गया था कि ... ‘कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में आस्था रखता हो, को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जायेगा, इस आदेश में संसद द्वारा 1956 में संशोधन कर दलित सिक्ख व दलित बौद्धों को भी इसमें शामिल कर दिया गया।

इस आदेश के तहत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण केवल हिन्दुओं (सिक्ख या बौद्ध दलितों) को उपलब्ध है, ईसाई या मुसलमान दलितों या किसी अन्य धर्मं के दलितों को नहीं और इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि "अनुसूचित जाति का हिन्दू केवल तब तक ही आरक्षण का लाभ ले सकता है, जब तक कि वह हिन्दू बना रहे अगर वह अपना धर्म परिवर्तित कर लेता है, तो वह आरक्षण का पात्र नहीं रहेगा।"

भारत के ख्रीस्तीय समुदाय में दो तिहाई दलितों की संख्या है जो देश की कुल आबादी (1.3 बिलियन) का 2.3 प्रतिशत है।

दलित ख्रीस्तीय और मुस्लिम 10 अगस्त को "काला दिवस" मानते और विरोध प्रदर्शन करते हैं क्योंकि इस दिन भेदभावपूर्ण राष्ट्रपति के आदेश पर हस्ताक्षर किया गया था।

उनका मानना हैं कि संविधान के संशोधन में राष्ट्रपति का आदेश भेदभावपूर्ण है तथा भारतीय संविधान जो कानून के सामने सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है उसका धर्म के नाम पर उलंघन किया गया है।

भारतीय काथलिक कलीसिया दलितों के लिए

दलित भारत के ईसाई समुदाय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा हैं, जो देश की लगभग 2.3 प्रतिशत आबादी का 2.3 प्रतिशत है। मुसलमान लगभग 14 फीसदी हैं।

भारत की काथलिक कलीसिया में दलित ईसाइयों के लिए सम्मान है। दलित ईसाइयों की सहायता भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जाति के लिए बने विभाग के कार्यालय द्वारा लॉबीइंग, वकालत, ज्ञापन, अदालती याचिकाओं, आंदोलनों और विरोध प्रदर्शन जैसे कार्यों के माध्यम से की जाती है।

2009 में पहली बार ‘काला दिवस’ मनाया गया। प्रति वर्ष सीबीसीआई, भारत में कलीसियाओं के राष्ट्रीय परिषद और दलित ईसाइयों के राष्ट्रीय परिषद द्वारा ‘काला दिवस’ का आयोजन किया जाता है।

कोविद -19 के तहत दलित ईसाइयों की दुर्दशा

इस वर्ष के काला दिवस के अवसर पर, वसई महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष फेलिक्स मचाडो ने कहा कि कोविद -19 और बंद के प्रभाव के तहत दलित ईसाइयों को बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है।

वाटिकन न्यूज से बात करते हुए, महाधर्माध्यक्ष फेलिक्स ने कहा कि "कोरोना वायरस के सभी प्रभावों का पहला शिकार दलित जैसे गरीब लोग हैं"। वे न केवल आर्थिक रूप से वंचित हैं और उनके पास आजीविका का कोई आवश्यक साधन नहीं है, बल्कि उन्हें "समाज में बेकार" समझा जाता है, जिनके प्रति घृणा, उपेक्षा और भेदभाव किया जाता है।

हालांकि कोविद -19 अपने रास्ते में आने वाले किसी भी व्यक्ति पर हमला करता है, दलित, कई मायनों में, महामारी के पहले और सबसे बड़े शिकार हैं। यही कारण है कि भारत की काथलिक कलीसिया की कार्रवाई विशेष रूप से दलितों पर केंद्रित है।

11 August 2020, 14:37