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गरीबों के साथ मदर बेर्नादेत्त का जन्म दिवस मनाते राँची के धर्माध्यक्ष एवं धर्मबहनें गरीबों के साथ मदर बेर्नादेत्त का जन्म दिवस मनाते राँची के धर्माध्यक्ष एवं धर्मबहनें 

मदर बेर्नादेत्त का 142वाँ जन्म दिवस, गरीबों की मदद के साथ मनाया

संत अन्ना की पुत्रियों के धर्मसंघ राँची ने कोरोना संकटकाल में अपनी संस्थापिका ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त का 142वाँ जन्म दिवस गरीबों की मदद करते हुए मनाया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

राँची, बृहस्पतिवार, 4 जून 2020 (ऑनलाईन न्यूज़) – ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त किसपोट्टा के जन्म दिवस पर 2 जून को राँची के एक सुदूर गाँव- सरगाँव में राशन एवं खाद्य सामग्री का वितरण किया गया।

मदर बेर्नादेत की तस्वीर
मदर बेर्नादेत की तस्वीर

राँची के महाधर्माध्यक्ष फेलिक्स टोप्पो एस.जे और सहायक धर्माध्यक्ष थेओदोर मस्करेनहस, राशन और खाद्य सामग्री वितरण कर, जन्म दिवस मनाने के इस समारोह में मुख्य अतिथि रहे। उनके साथ मदर जेनेरल सिस्टर लिंडा मेरी वॉन, प्रोविंशल सुपीरियर सिस्टर सोसन बड़ा, मदर जेनेरल की महासलाहकारिणी सिस्टर लिली ग्रेस तोपनो, सिस्टर जुली खाखा, सिस्टर मेरी पुष्पा तिरकी, मांडर के पल्ली पुरोहित फादर देवनिस खेस्स, राँची महाधर्मप्रांत के सचिव फादर सुशील एवं विभिन्न समुदायों की धर्मबहनों ने इस अवसर में भाग लिया।   

लोगों को राशन प्रदान करतीं धर्मबहनें
लोगों को राशन प्रदान करतीं धर्मबहनें

धर्माध्यक्षों एवं धर्मबहनों ने ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत्त के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर, सरगाँव जो उनका जन्म स्थान है वहाँ के अत्यन्त गरीब परिवारों को मदद करते हुए खुशी व्यक्त की।

ईश सेविका मदर मेरी बेर्नादेत किस्पोट्टा का जीवन

ईश सेविका मदर मेरी बेर्नादेत किस्पोट्टा, छोटानागपुर की काथलिक कलीसिया के लिए एक महान वरदान हैं। अपनों की सेवा करने की प्रेरणा ने उन्हें समाज के रीति रिवाज से अलग एक नयी जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा दी और  उन्होंने पूरे समाज में  एक नया बदलाव लाया।

मदर मेरी बेर्नादेत्त का जन्म 2 जून 1878 को माण्डर के सरगाँव में हुआ था। 26 जुलाई 1897 को  उन्होंने संत अन्ना की पुत्रियों के धर्मसंघ राँची की स्थापना की। 

मदर मेरी बेर्नादेत ने अपने जीवन में हमेशा पवित्र आत्मा की आवाज सुनी और उसी के अनुसार निर्णय लिया। मन्नत लेने के पूर्व धर्मसमाजी परिधान के रूप में, बेर्नादेत और उनकी सहेलियों को लोरेटो धर्मबहनों ने अपने समान यूरोपीय पहरावा चुनने की सलाह दी, किन्तु उन्होंने साधारण भारतीय पहरावा चुना। उनका कहना था कि हमारे देश में बहुत गरीबी है लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भारतीय पहरावा के द्वारा हम दुःख, महामारी और अत्याचार के समय में दशा-दशा के अनुसार अपने लोगों के बीच रहकर काम कर पायेंगी।

लोरेटो धर्मबहनों के कोलकाता वापस चले जाने पर, उर्सुलाईन की धर्मबहनें छोटानागपुर आयीं। जिनके साथ मिलकर वे छोटानागपुर के सुदूर क्षेत्रों में, पैदल यात्रा करते हुए गाँवों में जाकर सुसमाचार का प्रचार की और लोगों को सेवा दी।

ईश सेविका माता मेरी बेर्नादेत स्वभाव से अत्यन्त प्रसन्नचित थीं। वे धीरजवान थीं तथा सही निर्णय करना जानती थीं। वे होशियार भी थीं, बहुत पढ़ती और लिखती थीं। पापस्वीकार संस्कार एवं पवित्र मिस्सा में नियमित और बड़ी भक्ति से भाग लेती थी मानो कि वह उनके जीवन का अंतिम बार हो। वे सब कुछ को येसु के प्रेम से करती थीं। हर परिस्थिति में ईश्वर की इच्छा पहचानतीं और सब कुछ के लिए ईश्वर को धन्यवाद देतीं थीं। उन्होंने अपने जीवन में दूसरों से मिले हर छोटी चीज को बड़ी कृतज्ञता से स्वीकार किया। कष्टों को हमेशा साकारात्मक भाव से लिया। वे येसु को गहराई से जानना, पूरी शक्ति से प्यार करना और निकटता से उनका अनुसरण करना चाहतीं थीं। इस प्रकार येसु के अनुकरण में वे धर्मबहनों की एक महान आदर्श हैं। जेस्विट मिशनरियों के मार्गदर्शन में, संत इग्नासियुस की आध्यात्मिकता से प्रेरित होकर, उन्होंने उत्साह, गतिशीलता, पवित्रता और समर्पण का अभ्यास किया।

जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें सोसो में बीमारी से ठीक होने के लिए रखा गया था। गंभीर रूप से बीमार होने के कारण वे शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गयी थी। बाद में उन्हें राँची स्थित मूल मठ लाया गया। उन्हें असहय पीड़ा थी किन्तु  उन्होंने कभी शिकायत नहीं किया। वे ईश्वर की योजना के विपरीत कभी नहीं जाना चाहती थी और अपने हर दर्द को येसु को चढ़ाती थी। वे अक्सर कहा करती थीं कि येसु की पीड़ा के सामने मेरी पीड़ा बहुत कम है।

अपने जीवन के अंतिम समय में उसने महसूस किया कि येसु उन्हें बुला रहे हैं जिसके लिए वे बहुत पहले से तैयार थी। अपने कष्टों के बीच वे एक गीत गुनगुनाया करती थी, "मैं आपके स्वागत की ध्वनि सुनती हूँ।"

परलोक सिधरने के कुछ सप्ताह पहले उसने अपनी आवाज खो दी थी। वृद्धावस्था एवं टी.वी बीमारी के कारण माता बेर्नादेत ने 83 साल की उम्र में, 16 अप्रैल 1961 को संत अन्ना के मूल मठ में अंतिम सांस ली। उन्होंने येसु के प्रेम से एवं आत्माओं की मुक्ति के लिए, अपनी प्रार्थना, प्रायश्चित, सेवा और त्याग-तपस्या द्वारा, संत अन्ना धर्मसमाज एवं कलीसिया को 64 सालों तक अपनी सेवाएँ दीं।

काथलिक कलीसिया ने उनके विरोचित सदगुणों को मान्य देते हुए 7 अगस्त 2016 को ईश सेविका घोषित किया। वे प्रथम आदिवासी हैं जिन्हें छोटानागपुर से ईश सेविका घोषित किया गया है।

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04 June 2020, 17:03