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भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के नये कार्यालय का उदघाटन - 09.01.2020 भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के नये कार्यालय का उदघाटन - 09.01.2020 

भारतीय सरकार से छद्म राष्ट्रवाद को रोकने का आग्रह

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन ने, अपनी 34 वीं पूर्णकालिक सभा के उपरान्त,19 फरवरी को जारी एक वकतव्य में वार्ता, परस्पर सम्मान तथा जनकल्याण हेतु देश की धार्मिक परम्पराओं एवं संस्कृतियों के बीच सहयोग का आह्वान किया।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

बेंगालूरु, शुक्रवार, 21 फरवरी 2020 (रेई, वाटिकन रेडियो): भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन ने, अपनी 34 वीं पूर्णकालिक सभा के उपरान्त,19 फरवरी को जारी एक वकतव्य में वार्ता, परस्पर सम्मान तथा जनकल्याण हेतु देश की धार्मिक परम्पराओं एवं संस्कृतियों के बीच सहयोग का आह्वान किया।   

राष्ट्र निर्माण एवं जनकल्याण के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भारत की काथलिक कलीसिया ने वार्ता एवं सभी के साथ सहयोग के रास्ते पर आगे बढ़ने का प्रण किया। साथ ही, उसने एक "संकीर्ण और विभाजनकारी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" के खिलाफ अपील की, जो "प्रमुख प्रभुत्वशाली संस्कृति के अलावा अन्य संस्कृतियों की तौहीन" को प्रश्रय देता है।   

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन की 34 वीं पूर्णकालिक सभा में भाग लेनेवाले 192 धर्माध्यक्षों ने बुधवार को सभा के समापन पर अपना वकतव्य जारी किया। "वार्ताः सत्य एवं उदारता का मार्ग", शीर्षक से आयोजित पूर्णकालिक सभा 13 फरवरी से 19 फरवरी तक बेंगालूरु शहर में सम्पन्न हुई।  

सच्ची देशभक्ति

भारत के काथलिक धर्माध्यक्षों ने "संकीर्ण और विभाजनकारी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" के खिलाफ चेतावनी दी,  जो संवैधानिक राष्ट्रवाद से मूलतः भिन्न है।" धर्माध्यक्षों ने कहा, "देशभक्ति, सम्पूर्ण मानव परिवार की भलाई के लिए नागरिकों पर ध्यान  निर्देशित करने के रूप में परिभाषित की गई है, जो अलग-अलग संबंधों से एकजुट है तथा विभिन्न जातियों, लोगों एवं देशों को एक सूत्र में बाँधती है।"

काथलिक धर्माध्यक्षों ने कहा, "प्रमुख राष्ट्रवादी विचारधाराएँ जो कि प्रमुख प्रभुत्वशाली संस्कृति के अलावा अन्य संस्कृतियों की तौहीन करती हैं, अत्याचारों को प्रश्रय देती हैं।" उन्होंने कहा, "देशभक्ति राष्ट्र का निर्माण करती है जबकि छद्म राष्ट्रवाद राष्ट्र की अखंडता, एकता और सद्भाव को नष्ट करता है।"

नागरिकता, छद्म राष्ट्रवाद, सर्वसत्तावाद

सरकार के नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में काथलिक धर्माध्यक्षों ने सरकार से आग्रह किया है कि भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिये धर्म को मापदण्ड न बनाया जाये। ग़ौरतलब है कि भारत का नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2015 से पहले भारत आये, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को, भारत में बसने की अनुमति देता है, किन्तु मुसलमानों को यह सुविधा प्रदान नहीं करता।

भारतीय धर्माध्यक्षों के अनुसार मुसलमानों को इस सुविधा से वंचित करना भेदभावपूर्ण है। काथलिक धर्माध्यक्षों ने देश के अधिकारियों का आह्वान किया कि वे "भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच फैले भय, चिंता और अनिश्चितता की भावना को मिटाने" के लिए ईमानदारी और प्रभावशाली तरीके से आगे आयें तथा यह सुनिश्चित करें कि "छद्म राष्ट्रवाद सर्वसत्तावाद के नये रूपों का उदय न होने दे।"   

संविधान एकता का स्रोत

अपने वकतव्य में काथलिक धर्माध्यक्षों ने भारतीय संविधान में गर्व एवं विश्वास व्यक्त किया, जो अपने सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सुरक्षित करने का संकल्प करता है। उन्होंने भारत में व्याप्त विभिन्न धर्मों के अनुयायियों से अपील की कि वे एक-दूसरे और उनकी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करें और इस प्रकार शांति और सद्भाव को देकर जनकल्याण के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु परस्पर सहयोग कर सकें।

21 February 2020, 11:16