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पुण्य सप्ताह में भाग लेते भारत के ख्रीस्तीय पुण्य सप्ताह में भाग लेते भारत के ख्रीस्तीय  (AFP or licensors)

भारत के मुसलमानों एवं ख्रीस्तियों ने "काला दिवस" मनाया

1950 में लागू भारत का संविधान हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों को लाभ देता है, लेकिन ख्रीस्तियों और मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करता है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

भारत, मंगलवार, 13 अगस्त 2019 (ऊकान)˸ भारत के काथलिकों ने 10 अगस्त को "काला दिवस" के रूप में मनाया तथा उस भेदभाव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जिसको उन्हें देश में दलित ख्रीस्तीय एवं मुस्लिम के रूप में झेलना पड़ता है।  

भारतीय धर्माध्यक्षों ने लोगों को याद दिलाया कि देश के संविधान में दलित ख्रीस्तीयों के प्रति भेदभाव किया जाता है।

दलित कौन हैं?

"दलित" लोग पिछड़े वर्ग के लोग समझे जाते हैं और जिन्हें पहले अछूत माना जाता था। उनकी सामाजिक स्थिति बहुत नीचे है। हिन्दू समाज में तो उनके लिए कोई जगह ही नहीं है। भारत के संविधान में दलितों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेषाधिकार और लाभ दिए गये है, खासकर सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में ताकि वे समाज में ऊपर उठ सकें।  

भारत के ख्रीस्तीय समुदाय में दो तिहाई दलितों की संख्या है जो देश की कुल आबादी (1.3 बिलियन) का 2.3 प्रतिशत है।

भेदभाव

संविधान जिसपर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 10 अगस्त 1950 को हस्ताक्षर किया था, उसके आदेश अनुसार अनुसूचित जनजाति के तीसरे अनुच्छेद में कहा गया था कि ... ‘कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में आस्था रखता हो, को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जायेगा, इस आदेश में संसद द्वारा 1956 में संशोधन कर दलित सिक्ख व दलित बौद्धों को भी इसमें शामिल कर दिया गया।

इससे साफ है कि इस आदेश के तहत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण केवल हिन्दुओं (सिक्ख या बौद्ध दलितों सहित) को उपलब्ध है, ईसाई या मुसलमान दलितों या किसी अन्य धर्मं के दलितों को नहीं और इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि "अनुसूचित जाति का हिन्दू केवल तब तक ही आरक्षण का लाभ ले सकता है, जब तक कि वह हिन्दू बना रहे अगर वह अपना धर्म परिवर्तित कर लेता है, तो वह आरक्षण का पात्र नहीं रहेगा।"

दलित ख्रीस्तीय और मुस्लिम 10 अगस्त को "काला दिवस" मानते और विरोध प्रदर्शन करते हैं क्योंकि इस दिन भेदभावपूर्ण राष्ट्रपति के आदेश पर हस्ताक्षर किया गया था।

उनका मानना हैं कि संविधान के संशोधन में राष्ट्रपति का आदेश भेदभावपूर्ण है तथा भारतीय संविधान जो कानून के सामने सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है उसका धर्म के नाम पर उलंघन किया गया है।

ख्रीस्तीय एकजुट

2009 में पहली बार काला दिवस मनाया गया था जिसका आह्वान भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन, भारत की कलीसियाओं के राष्ट्रीय परिषद तथा दलित ख्रीस्तियों के राष्ट्रीय समिति ने संयुक्त रूप से किया था।

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जाति विभाग के सचिव फादर विजय कुमार नायक ने कहा कि इस काला दिवस को भारत के करीब सभी राज्यों में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिनाडु और आंध्रप्रदेश में इसे विशेष रूप से याद किया जाता है।  

फादर नायक ने वाटिकन रेडियो को बतलाया कि काला दिवस के दिन कलीसिया के अधिकारी, दलित ख्रीस्तीय और मुसलमान तथा भले इच्छा रखने वाले लोग सभा में भाग लेते हैं तथा प्रदर्शन एवं रैलियाँ कर, 1950 के राष्ट्रपति के भेदभावपूर्ण आदेश का विरोध किया जाता है। वे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य सरकारी अधिकारियों को ज्ञापन सौंपते हैं।

फादर नायक ने याद किया कि 2004 में दलित मुसलमानों एवं ख्रीस्तियों की ओर से धार्मिक भेदभाव के कारण, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर किया गया था।

फादर नायक इस बात से उत्साहित हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में सुनवाई शुरू करने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि उनके पास आवश्यक दस्तावेज हैं, लेकिन एक प्रसिद्ध अधिवक्ता की तलाश कर रहे हैं ताकि वे अपना केस लड़ सकें।

13 August 2019, 17:13