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फादर जॉन बैपटिस्ट हॉफमैन येसु समाजी फादर जॉन बैपटिस्ट हॉफमैन येसु समाजी 

झारखंड की पल्ली में मिशनरी की प्रतिमा का विरोध

हिंदू राजनीतिक दल द्वारा झारखंड की पल्ली में मिशनरी की प्रतिमा के विरोध में काथलिक नेताओं का कहना है कि भाजपा ने झारखंड राज्य में आदिवासी लोगों को विभाजित करने के लिए विवाद छेड़ दिया है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

भोपाल, सोमवार 18 फरवरी 2019 (उकान) : हिंदू राजनीतिक दल के कुछ सदस्यों ने काथलिक गिरजाघर के बाहर एक जर्मन जेसुइट पुरोहित की प्रतिमा का विरोध किया है, उनका दावा है कि मिशनरी ने स्थानीय लोगों के खिलाफ काम किया और उनकी प्रतिमा को सम्मान देना, आदिवासियों की भावनाओं का अपमान होगा।

13 फरवरी को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आदिवासी समूह ने झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर खूंटी जिले में स्थित सरवदा पल्ली के परिसर से फादर जॉन बैपटिस्ट हॉफमैन की प्रतिमा को हटाने के लिए पुलिस से निवेदन किया।

आदिवासी समूह के नेता राम कुमार पहान ने मीडिया को बताया कि आदिवासी अधिकारों के लिए विदेशियों से लड़ने वाले बिरसा मुंडा जैसे स्थानीय आदिवासी नेताओं का अपमान होगा। इसलिए उन्होंने जर्मन फादर जॉन बैपटिस्ट हॉफमैन प्रतिमा को हटाने के लिए पुलिस को बुलाया।

दिसंबर में इसकी स्थापना के बाद से वे प्रतिमा का लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन फरवरी के दूसरे सप्ताह में अपनी कार्रवाई तेज कर दी क्योंकि राज्य में राष्ट्रीय चुनाव करीब है।

कलीसिया के नेताओं का कहना है कि झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है और भाजपा ने जानबूझकर मिशनरी के खिलाफ विवाद पैदा कर आदिवासियों को विभाजित कर रही है। आदिवासी वोटों को धार्मिक तर्ज पर बांटने से बीजेपी को गैर-ईसाई आदिवासी वोट हासिल करने में मदद मिल सकती है।

खूंटी के धर्माध्यक्ष बिनय कंडूलना के सचिव फादर मसीह प्रकाश सोय ने कहा, “विवाद सत्तारूढ़ भाजपा का आदिवासी लोगों को विभाजित करने की एक चाल है। भाजपा अपने वादों को पूरा करने और लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में बुरी तरह विफल रही है।”

हिंदू नाराज हैं क्योंकि फादर की प्रतिमा के पास एक पट्टिका में अंकित है, “फादर हॉफमैन 1908 छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट के मुख्य वास्तुकार थे, जो कि अंग्रेजों ने गैर आदिवासी लोगों को आदिवासियों की भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित करने के लिए अधिनियमित किया था। वे दावा करते हैं कि बिरसा मुंडा के संघर्ष ने कानून का नेतृत्व किया।

फादर जॉन बैपटिस्ट हॉफमैन

फादर हॉफमैन (1857-1928) 20 साल की उम्र में जेसुइट नवशिष्य के रूप में भारत आए थे। एक पुरोहित के रूप में, उन्होंने वर्तमान झारखंड क्षेत्र में मुंडा आदिवासी लोगों के बीच काम किया और एक सहकारी समिति और बैंक की स्थापना की और उनके अधिकारों के लिए काम किया।

राज्य की राजधानी रांची में स्थित समाज सेवी जेसुइट फादर जेवियर सोरेंग ने कहा कि आदिवासी लोगों की रक्षा के लिए कानून बनाने में मदद करने के अलावा, उन्होंने मुंडा संस्कृति और सभ्यता पर एक व्याकरण पुस्तक और 15 खंडों का मुंडा विश्वकोश प्रदान करके उनकी भाषा और संस्कृति में योगदान दिया।

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के महासचिव धर्माध्यक्ष थियोडोर मस्करेनहास ने कहा कि अधिकांश आदिवासी लोग मिश्नरियों के योगदान को समझते हैं। उन्होंने कहा कि विरोध “एक छोटे समूह” से आता है जो शांति को बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन लोग मूर्ख नहीं हैं ... वे जानते हैं कि किसने ,किसके लिए क्या किया था।"

उन्होंने कहा कि कलीसिया को इस तरह के विरोध प्रदर्शनों को नजरअंदाज करना चाहिए क्योंकि इन समूहों का उद्देश्य राजनीतिक लाभ के लिए समाज को बांटना और तोड़ना है।

18 February 2019, 16:12