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Vatican News
चीन के धर्माध्यक्ष बपतिस्मा देते हुए चीन के धर्माध्यक्ष बपतिस्मा देते हुए  (AFP or licensors)

चीनी पुरोहित द्वारा कैदी धर्माध्यक्षों की चिंता

चीन के फादर पीटर जिन्हें अपने विश्वास के लिए कई सालों तक जेल में गुजारना पड़ा, उन्होंने वाटिकन को सुझाव दिया है कि वह उन भाइयों पर ध्यान दे, जो अब भी पीड़ित हैं। चीन-वाटिकन समझौते ने उन अवैध धर्माध्यक्षों की नैतिकता पर भ्रम पैदा कर दी है। जिनके साथ मेल-मिलाप कर लिया गया है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

बीजिंग, बृहस्पतिवार, 29 नवम्बर 2018 (एशियान्यूज) चीन में प्रेरितिक केंद्र के पुरोहित फादर पीटर ने कहा है कि परमधर्मपीठ को उन धर्माध्यक्षों को ध्यान देना चाहिए जो अब भी जेल में हैं। 

संत पापा फ्राँसिस के मिशन की सराहना करने के साथ-साथ फादर पीटर ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि वे चीन-वाटिकन समझौते पर असमंजस में हैं। उनका मानना है कि उन धर्माध्यक्षों के प्रति जो अपने विश्वास में हमेशा निष्ठावान बने रहे तथा उन धर्माध्यक्षों के प्रति जो अनैतिक रूप से अभिषिक्त हुए हैं उन्हें माफ कर, एक स्तर पर रखा जाना, स्वीकार्य नहीं है।

फादर पीटर का अटूट विश्वास

"मेरे दिल में विवादित विचार" शीर्षक एक संदेश में फादर पीटर ने लिखा है कि बिना गौर किये उन्होंने कलीसिया में तीस साल बिताये हैं। उन्होंने कहा, "उन तीस वर्षों को पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मेरा हृदय कई प्रकार के विवादित विचारों से भर जाता है और मैं उदास हो जाता हूँ।"   

उन्होंने लिखा कि यद्यपि संत पापा जॉन पौल द्वितीय के परमाध्यक्षीय काल में हम विरोध की स्थिति का सामना कर रहे थे, जेल की जोखिम थी किन्तु विश्वास की स्पष्टता एवं कई साहसिक साक्ष्यों द्वारा हमें सब कुछ का सामना निडर होकर करने में मदद मिली। 

मैंने कठिन परिस्थिति में ईशशास्त्र की पढ़ाई की। हमें छिपकर रहना पड़ा तथा हमने साधारण भोजन ग्रहण करते हुए, ईश्वर की स्तुति की। मैंने हमेशा त्याग की भावना से अपने आप को तैयार किया। इस सब के बीच भी मैं ईश्वर के प्रति कृतज्ञ बना रहा तथा उनके साथ गहरे आनन्द का एहसास किया। 1980 एवं 1990 में दो बार जेल जाना पड़ा, फिर भी, मैं ख्रीस्तीय विरोधी हमलों से विचलित नहीं हुआ, और न ही सुसमाचार प्रचार करने से रूका। 

संत पापा बेनेडिक्ट से प्रेरणा

2 अप्रैल 2005 को संत पापा जॉन पौल द्वितीय के निधन के बाद, 19 अप्रैल 2005 को संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें परमाध्यक्ष चुने गये। यद्यपि शुरू में मैंने सोचा कि वे एक रूढ़ीवादी संत पापा हैं तथापि यह विचार मुझे उनके प्रति निष्ठावान बने से नहीं रोक सकी। 

संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें के ईशशास्त्रीय दृढ़ता तथा उनकी गहरी आध्यात्मिकता ने मुझे ईश्वर की महानता पर गौर करने में मदद दी। 

28 फरवरी 2013 को जब संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने परमाध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, तब मैंने भी अपने आप में कमजोर महसूस किया।

13 मार्च 2013 को संत पापा फ्राँसिस जब परमाध्यक्ष बने, तब कलीसिया में तुरन्त बदलाव महसूस किया गया। 

धर्माध्यक्षों को गौण किया जाना अनुचित

विश्व और चीन दोनों के लिए ही उनके प्रयास एवं कार्यप्रणाली कई बार अनापेक्षित रहे हैं, शायद, इसलिए क्योंकि कलीसिया के विगत अधिकारियों के निर्देश ने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया था किन्तु चीन एवं वाटिकन के बीच पवित्र समझौता ने मुझे असमंजस एवं घाटे में डाल दिया है। मैं यहाँ वैध धर्माध्यक्षों की नैतिकता पर ध्यान केंद्रित करने का इरादा नहीं रखता, लेकिन उन धर्माध्यक्षों को गौण करने को मैं अनुचित समझता हूँ जो हमेशा निष्ठावान बने रहे। 

अत्याचार के शिकार लोगों के लिए फादर पीटर की अपील

उन्होंने चीन के पीड़ित लोगों की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि परमधर्मपीठ को उन धर्माध्यक्षों पर ध्यान देना चाहिए जो अब भी कैदी हैं। इस बात को स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वे विश्वास के खातिर कैदी हैं तथा उन्हें वह अधिकार एवं स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जिनके वे हकदार हैं। अन्यथा, वे कभी यह महसूस नहीं कर पायेंगे कि उनके साक्ष्य का सचमुच कुछ मूल्य हैं।   

 

29 November 2018, 16:55