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कंधमाल ख्रीस्तीय विरोधी हिंसा की दसवीं सालगिराह कंधमाल ख्रीस्तीय विरोधी हिंसा की दसवीं सालगिराह  

कंधमाल के शहीदों के लिए संत पापा को पत्र

ओडिशा के कंधमाल में वर्ष 2008 में हुई हिंसा के शिकार लोगों को शहीद घोषित किये जाने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए एक शीर्ष काथलिक नेता ने संत पापा फ्रांसिस को पत्र लिखा है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

अखिल भारतीय काथलिक संघ के पूर्व अध्यक्ष जोन दयाल ने कंधमाल में ख्रीस्तीय विरोधी हिंसा की 10वीं सालगिराह पर 25 अगस्त को, भारत के प्रेरितिक राजदूत महाधर्माध्यक्ष जॉम्बतिस्ता दीक्वात्रो के माध्यम से संत पापा को एक पत्र प्रेषित किया।

उन्होंने पत्र में लिखा, "मैं धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न तथा दलितों एवं आदिवासी लोगों के खिलाफ राज्य द्वारा लक्षित हिंसक कार्रवाई के लिए दबाव पर दस्तावेज भेज रहा हूँ। ऐसा करते हुए मैं मानवीय भावना के पलटाव एवं समाज के गरीब एवं कमजोर लोगों के ख्रीस्तीय विश्वास को प्रस्तुत कर रहा हूँ।"

आदिवासियों के प्रति संत पापा की चिंता

"प्रिय संत पापा,  जो दुनिया में हमारे विश्वासी समुदाय के शीर्ष है, आपको यह उनसे, पत्र लिखने की प्रेरणा प्राप्त करता हूँ। हाशिये पर जीवन यापन करने वाले लोगों एवं अमरीका, अफ्रीका एवं एशिया के विभिन्न आदिवासियों के प्रति आपकी चिंता के कारण मैं यह लिखने का साहस कर रहा हूँ जिन्हें जाति और नस्ल के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है। हम भारत के विश्वासियों के प्रति आपके समर्थन को जानते हैं।"

भारत की कलीसिया

उन्होंने पत्र में लिखा कि भारत में विश्वासी समुदाय प्राचीन और नवजात दोनों हैं। यहाँ के कुछ लोगों ने 16वीं एवं 17वीं शताब्दी में संत थॉमस द्वारा विश्वास की ज्योति प्राप्त की है किन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने हाल ही में पवित्र आत्मा के स्पर्श, ख्रीस्त के प्रेम एवं माता मरियम की ममता का एहसास किया है। देश की आजादी के साथ धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गयी और हमने शांति से जीवन यापन किया किन्तु हमने 2008 में ओडिशा के कंधमाल जिला में ख्रीस्तियों  के विरूद्ध दूसरी सबसे बड़ी हिंसा देखी है। इसकी शुरूआत 25 अगस्त 2008 को हुई थी और जो कई सप्ताहों तक जारी रही।

कंधमाल में हिंसा की घटना

उन्होंने लिखा कि जब हिंसा का अंत हुआ तब करीब 60,000 से अधिक बच्चे, महिलाएँ, पुरूष, वृद्ध, युवा, नवजात एवं गर्भवती महिलाएँ जंगल की ओर भाग चुके थे। बाद में 30,000 लोग सरकारी शरणार्थी शिविर में रखे गये। करीब 400 गाँवों के ख्रीस्तियों को एक साल के लिए साफ कर दिया गया। 300 गिरजाघरों के साथ-साथ विभिन्न शिक्षण संस्थाओं, स्वस्थ्य केंद्रों और 6000 से अधिक घरों को ध्वस्त कर दिया गया। फादर बर्नार्ड दिगल समेत 120 ख्रीस्तियों को मार डाला गया। कई महिलाओं एवं धर्मबहनों को बलत्कार का शिकार होना पड़ा।   

हिंसक घटना के दस साल बाद की स्थिति 

ख्रीस्तीय विरोधी हिंसा के दस वर्षों बाद भी आज पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया है। अधिकतर हत्यारों को जेल से रिहा कर दिया गया है। ध्वस्त किये गये घरों के पुनःनिर्माण हेतु भारत के उच्चतम न्यायालय में पीड़ितों को मुआवजा प्राप्त करने में कई साल लग गये।  

जीवन का निर्माण करना कठिन काम है। विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। बच्चे मानसिक आघात से पीड़ित हैं। कई परिवार टूट गये हैं। कई की जीविका नष्ट हो गयी है। कुछ लोग मानव तस्करी के शिकार भी हो गये हैं।

28 August 2018, 16:58